स्वतंत्रता : मोहम्मद का नुस्खा ओशो का शहद

मोहम्मद का एक शिष्य है, अली। और अली मोहम्मद से पूछता है कि बड़ा विवाद है सदा से कि मनुष्य स्वतंत्र है अपने कृत्य में या परतंत्र! बंधा है कि मुक्त! मैं जो करना चाहता हूं वह कर सकता हूं या नहीं कर सकता हूं?

सदा से आदमी ने यह पूछा है। क्योंकि अगर हम कर ही नहीं सकते कुछ, तो फिर किसी आदमी को कहना कि चोरी मत करो, झूठ मत बोलो, ईमानदार बनो, नासमझी है! एक आदमी अगर चोर होने को ही बंधा है, तो यह समझाते फिरना कि चोरी मत करो, नासमझी है! या फिर यह हो सकता है कि एक आदमी के भाग्य में बदा है कि वह यही समझाता रहे कि चोरी न करो–जानते हुए कि चोर चोरी करेगा, बेईमान बेईमानी करेगा, असाधु असाधु होगा, हत्या करने वाला हत्या करेगा, लेकिन अपने भाग्य में यह बदा है कि अपन लोगों को कहते फिरो कि चोरी मत करो! एब्सर्ड है! अगर सब सुनिश्चित है तो समस्त शिक्षाएं बेकार हैं; सब प्रोफेट और सब पैगंबर और सब तीर्थंकर व्यर्थ हैं। महावीर से भी लोग पूछते हैं, बुद्ध से भी लोग पूछते हैं कि अगर होना है, वही होना है, तो आप समझा क्यों रहे हैं? किसलिए समझा रहे हैं?

मोहम्मद से भी अली पूछता है कि आप क्या कहते हैं?

अगर महावीर से पूछा होता अली ने तो महावीर ने जटिल उत्तर दिया होता। अगर बुद्ध से पूछा होता तो बड़ी गहरी बात कही होती। लेकिन मोहम्मद ने वैसा उत्तर दिया जो अली की समझ में आ सकता था। कई बार मोहम्मद के उत्तर बहुत सीधे और साफ हैं। अक्सर ऐसा होता है कि जो लोग कम पढ़े-लिखे हैं, ग्रामीण हैं, उनके उत्तर सीधे और साफ होते हैं। जैसे कबीर के, या नानक के, या मोहम्मद के, या जीसस के। बुद्ध और महावीर के और कृष्ण के उत्तर जटिल हैं। वह संस्कृति का मक्खन है। जीसस की बात ऐसी है जैसे किसी ने लट्ठ सिर पर मार दिया हो।

कबीर तो कहते ही हैं: कबीरा खड़ा बजार में, लिए लुकाठी हाथ

लट्ठ लिए बाजार में खड़े हैं! कोई आए हम उसका सिर खोल दें!

मोहम्मद ने कोई बहुत मेटाफिजिकल बात नहीं कही।

मोहम्मद ने कहा, अली, एक पैर उठा कर खड़ा हो जा!

अली ने कहा कि हम पूछते हैं कि कर्म करने में आदमी स्वतंत्र है कि परतंत्र!

मोहम्मद ने कहा, तू पहले एक पैर उठा!

अली बेचारा एक पैर–बायां पैर–उठा कर खड़ा हो गया।

मोहम्मद ने कहा, अब तू दायां भी उठा ले।

अली ने कहा, आप क्या बातें करते हैं!

तो मोहम्मद ने कहा कि अगर तू चाहता पहले तो दायां भी उठा सकता था। अब नहीं उठा सकता।

तो मोहम्मद ने कहा कि एक पैर उठाने को आदमी सदा स्वतंत्र है। लेकिन एक पैर उठाते ही तत्काल दूसरा पैर बंध जाता है।

वह जो नॉन-एसेंशियल हिस्सा है हमारी जिंदगी का, जो गैर-जरूरी हिस्सा है, उसमें हम पूरी तरह पैर उठाने को स्वतंत्र हैं। लेकिन ध्यान रखना, उसमें उठाए गए पैर भी एसेंशियल हिस्से में बंधन बन जाते हैं। वह जो बहुत जरूरी है वहां भी फंसाव पैदा हो जाता है। गैर-जरूरी बातों में पैर उठाते हैं और जरूरी बातों में फंस जाते हैं।

साभार – (ओशोज्योतिष अद्वैत का विज्ञान)

 

7 Responses to “स्वतंत्रता : मोहम्मद का नुस्खा ओशो का शहद”

  1. bouth he aacha post kiya hai aapne dear….. aacha lagaa

  2. गैर-जरूरी बातों में पैर उठाते हैं और जरूरी बातों में फंस जाते हैं…..काश कोई सबक ले .सुंदर .तर्क के बादशाह थे ओशो लाजवाब .

  3. बढ़िया पोस्ट! सरल शब्दों में बड़ी सहजता से जीवन का अहम सच सामने आ जाता है.

  4. ओशो…बेहतर…हमेशा की तरह…

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