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फ़रवरी 17, 2011

दर्द सीने में परिहास लबों पर…

तकदीर बदल जाने का विश्वास लिए फिर रहे हैं
बेआस हुए बहुत फिर भी आस लिए फिर रहे हैं

रोती हुई गज़ल जन्म रही है ज़हन की वादी में
उजड़े हुए शब्द बेवा का अहसास लिए फिर रहे हैं

खराबी शराब में है या जाने तेरी नीयत में साकी
तेरे मैकदे के तो प्याले भी प्यास लिए फिर रहे हैं

गीतों भरी शाम को भी मिला सन्नाटों का सफर
तन है महफ़िल में मन वनवास लिए फिर रहे हैं

उन दीवानों की प्यास का खुदा ही हाफिज है जो
मरिचिकाओं में पानी का आभास लिए फिर रहे हैं

आँख से बह जाये तो आंसू पानी हो जाता है यार
दर्द है सीने में और लब परिहास लिए फिर रहे हैं

जिनको बहुत गुमान था मयकदे की रौनक हैं हम
अक्सर देखा के ज़माने की प्यास लिए फिर रहे हैं

(रफत आलम)

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