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फ़रवरी 16, 2011

मामा के तप का अपमान न हो पायेगा

साहब, कोई सज्जन हैं, कहते हैं इंग्लैंड से आये हैं और आपसे मिलना चाहते हैं।

अर्दली ने एक विज़िटिंग कार्ड नरेन्द्र प्रताप को दे दिया।

नरेंद्र ने कार्ड देखा। उस पर एक नाम अंग्रेजी में सुनहरे अक्षरों में छपा था। उन्होने पढ़ा – कुमार हेमेन्द्र प्रताप।

नाम ने उन्हे पहलू बदलने के लिये विवश किया। हेमेंद्र प्रताप- नाम तो वह कितनी जगह लिखने को अभिशप्त रहे हैं। उन्हे पसंद न आने वाले नाम से मिलते नाम ने उन्हे थोड़ी देर के लिये विचारों में धकेल दिया।

अर्दली ने फिर पूछा,” साहब क्या कहूँ उनसे?”

विचारों से बाहर आकर उन्होने अर्दली से कहा,” अंदर भेज दो, देखो कह देना पंद्रह मिनट से ज्यादा वक्त्त नहीं है मेरे पास और ड्राइवर को बोलो कि गाड़ी तैयार रखे, पंद्रह मिनट बाद निकलना है मीटिंग के लिये”।

अर्दली ने विज़िटर को हिदायत दे दी,” आप मिल सकते हैं पर साहब के पास सिर्फ पंद्रह मिनट हैं सो समय का ख्याल रखें”।

हेमेंद्र कक्ष में दाखिल हुये तो नरेंद्र ने निगाह उठाकर उन्हे देखा। पचपन से साठ के बीच की आयु के लगे आगंतुक। नरेंद्र को देख कर हेमेंद्र की आँखें कुछ सिकुड़ गयीं। उनके हाथ नमस्ते करने के लिये जुड़ते- जुड़ते काँप कर रह गये।

नरेंद्र को आगंतुक का चेहरा पहचाना सा लगा।

आइये बैठिये। कहिये क्या काम है आपको मुझसे?

हेमेंद्र ने कुछ कहना चाहा पर लगा जैसे बोल नहीं निकलेंगे। उनके होंठ लरज़ कर रह गये। वे खामोशी के साथ सामने बैठे युवा अधिकारी को देखते रहे।

नरेंद्र ने उन्हे फिर टोका,” महोदय, कहिये क्या काम है आपको मुझसे। मुझे कहीं जाना है अतः आप जल्दी ही अपनी बात कहें”।

तुम… आपने शायद मुझे पहचाना नहीं होगा… बहुत छोटे थे आप …जब…।

धीमी आवाज में हेमेंद्र कह पाये।

जी नहीं मैंने आपको पहचाना नहीं पर ऐसा लग जरुर रहा है कि आपको कहीं देखा है। खैर आप काम बताइये।

मैं तो लंदन में रहता हूँ। कुछ साल पहले यहाँ जमीन खरीदी थी। सोचा था कि एक फाइव स्टार रिसोर्ट बनाऊँगा पर अब नये पर्यावरण कानून के कारण अनुमति नहीं मिल पा रही है।

इसमें मैं क्या कर सकता हूँ।

हेमेंद्र कुछ पल नरेंद्र को देखते रहे।

बे..टा तु..म… आपने मुझे पहचाना नहीं … मैं हरेंद्र प्रताप हूँ… आपका पिता…मैं तो बहुत साल बाद भारत आया हूँ आकर पता चला कि आप आई.ए.एस बन गये हो.. तो अपने को रोक नहीं पाया मिलने से।

नरेंद्र के चेहरे पर हैरत भरे भाव आ गये। अब उन्हे याद आ गया कि एक बार उन्होने सामने बैठे हेमेंद्र प्रताप की तस्वीर अपने मामा के पास देखी थी।
उन्होने मन में सोचा – तो अब ये कुमार हेमेंद्र प्रताप कहलाते हैं।

अपने मनोभावों को नियंत्रित करके वे दृढ़ता से बोले,” पर मेरे पिता तो हैं नहीं। मैंने तो जब से होश संभाला है किसी पिता को अपने पास नहीं देखा”।

बेटा ऐसा मत कहो… मैं मानता हूँ मुझसे गलती हुयी थी जो मैं मनोरमा…तुम्हारी माँ और तुम्हे तब छोड़कर विदेश चला गया था जब तुम केवल डेढ़ साल के थे। जाने क्या धुन थी विदेश जाने और धन कमाने की कि…. वहाँ जाकर कभी सुध भी नहीं ली मनोरमा और तुम्हारी।
हेमेंद्र ने काँपती आवाज में कहा।

नरेंद्र ने पहले से भी ज्यादा दृढ़ता से कहा,” मैंने आपसे कहा न कि मेरे कोई पिता नहीं है। बचपन से ही मेरे मामा ने मेरा लालन-पालन किया है। मैं और मेरी माँ मेरे बचपन से ही मेरे मामा के घर रहे हैं।”

बेटा, मैं अपराधी हूँ मनोरमा, तुम्हारा और कुलदीप का। मैं तुम सबसे माफी माँगने को तैयार हूँ।”

माफी? किस बात की? मुझसे किस बात की माफी?

मैंने तुम्हे और तुम्हारी माँ को निराश्रय छोड़ दिया था।

माँ की बात माँ ही जाने, पर मैंने जब से होश संभाला है मैं तो कभी निराश्रय नहीं रहा। मेरे मामा और माँ की स्नेहमयी छत्रछाया सदा मेरे ऊपर रही। मुझे तो किसी बात की, किसी भी रिश्ते की कमी कभी महसूस हुयी नहीं।

बेटा मुझे ऐसे ठुकराओ मत। मैं मनोरमा से माफी माँग लूँगा। तुम गुस्सा त्याग कर बीती बातें भूल जाओ और मेरी भूल को क्षमा कर दो।

गुस्सा! मैं कतई भी गुस्से में नहीं हूँ। मैंने आपसे कहा न कि मेरा कोई पिता नहीं है और यह बात मैं क्रोधवश नहीं कह रहा। मेरा सच यही है। मेरा आपसे कोई नाता है ही नहीं जो मैं आपसे नाराज होऊँगा। मेरे लिये आप एक अजनबी हैं।

बाप-बेटे और पति-पत्नी के रिश्ते कैसे ऐसे नज़र अंदाज किये जा सकते हैं।

देखिये बाप-बेटे के रिश्ते की बात तो मैं आपको स्पष्ट कर चुका हूँ। जहाँ तक मैं अपनी माँ को जानता हूँ उन्होने कभी मुझे ऐसा नहीं दर्शाया कि वे अपने पति की अनुपस्थिति के कारण दुखी रही हैं। मेरे इर्द-गिर्द ही उनका जीवन घुमता रहा है। ऐसा तो है नहीं कि विदेश में आप बिना दूसरा विवाह किये रहे होंगे। आपमें इतना विश्वास और साहस हो कि आप मेरी माँ की आँखों में देखकर बात कर सकें तो जायें। मैं बिल्कुल आप दोनों की बात के बीच में नहीं पड़ूँगा। आप बेहिचक प्रयास कर सकते हैं मेरी माँ से मिलने का। मुझे लगता नहीं कि आप उनके लिये जीवित भी रहे होंगे अभी तक।

ऐसा मत कहो। एक बार मुझे अपने पिता के रुप में स्वीकार कर लो, मैं वापिस चला जाऊँगा।

नरेंद्र ने गम्भीर किंतु मृदु लहज़े में कहना प्रारम्भ किया।

“मैंने आपसे कई बार यह बात कही है कि मेरा कोई पिता नहीं है। मेरे जीवन में पिता का कोई स्थान नहीं है। आप हमारे जीवन से गये वह आपका कृत्य था और आप हमारे जीवन से गायब हो गये हैं यह हमारे जीवन का सत्य है। पितृ-स्वरुप पुरुष का अस्तित्व मैंने अपने मामा में पाया है, मैंने बहुत लोगों के पिताओं को देखा है पर मेरे मामा से अच्छा पिता देखने क्या सुनने को भी नहीं मिला। पति द्वारा छोड़ दी गयी बहन और उसके डेढ़ साल के बेटे का भरण पोषण उस आदमी का जीवन ध्येय बना रहा है सालों से। इस तप में बाधा न पड़ जाये इस नाते उस आदमी ने अपना घर नहीं बसाया। जीवन के हर मोड़ पर मुझे उनके हाथों ने थामा है। ऐसे तपस्वी के सानिध्य में रहने से मुझे ऐसे संस्कार मिले हैं कि मैं उनकी तपस्या का अपमान न करुँ। मेरी इतनी हैसियत भी नहीं है कि मैं अपने मामा का पितृ-ऋण चुका सकूँ। अगर मुझे वास्तव में एक प्रतिशत भी जीवन में पिता की कमी खली होती तब भी इतना दुस्साहस तो मैं तब भी न करता कि उनके स्नेह का अपमान करता अब आपसे किसी भी किस्म का रिश्ता बनाने का। आपका कोई अस्तित्व है ही नहीं मेरे लिये और अपनी माँ की तरफ से भी मैं पूरी निश्चितता के साथ कह सकता हूँ कि उनके विचार भी ऐसे ही होंगे। हम लोग अपने जीवन में खुश रहे हैं। आप भी अपने जीवन में रमे रहें। मैं इस विषय में और कुछ कहना नहीं चाहता। आज के बाद आप कभी किसी काम से आयें तो इस बात को समझ कर आयें कि इस विषय पर जीवन में अब कोई बात नहीं हो पायेगी। आपके नाम का कोई भी अध्याय हमारे जीवन में है ही नहीं। अब मैं चलूँगा। मुझे आवश्यक काम से बाहर जाना है। नमस्कार!”

…[राकेश]

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