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फ़रवरी 15, 2011

जिसे प्रेम कहते हैं

जहाँ रेशमी ख्याल हों
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मैंने कब नहीं चाहा कि
तुम्हारी बाँहों का घेरा
बने वृत्त मेरा
या कि तुम्हारी साँसों की गरम भाप मुझे
ले जाये अपनी सरगमी दुनिया में
जहाँ रेशमी ख्याल हों।

मैंने कल फिर पंछियों को देखा था
ठहरकर प्यार करते हुये
उनके पंख फड़फड़ा रहे थे
और चोंचें खोज रही थीं
देह में वह खज़ाना
– जिसे प्रेम कहते हैं,
मैंने सोचा कि यह बात मुझे तुमसे कहनी है
अपनी भाषा में
स्पर्श से।

तुमने कमल के फूलों से भरा तालाब देखा है
सुबह उसमें होते हैं सिर्फ फूल और भौंरे
तालाब का पानी उनकी मोहब्बत का
खामोश गवाह है।

यह पूछना उतना ही गैर जरुरी है किसी अपने से
कि तुम मुझे कितना चाहते हो
हाँ, उसे देना होता है प्यार…
इतना प्यार…
कि वह यकीन न कर पाये कि
इतना प्यार मिलता है दुनिया में!

शब्दों में व्यक्त्त नहीं होता प्यार
आसमान की ओर देखती आँखें
धरती की ओर ललक से गिरती बारिश की बूँदें
या फिर ओस की पड़ती फुहार
बताती हैं अपनी क्रियाओं से
कि जो कुछ उन्हे कर रहा है बैचेन
-वही है प्यार!

जब कभी तुम्हारी आँखों में मेरी छवि
किसी एक पल के सबसे छोटे हिस्से में कौंधे
तो सोचना कि तुम उसके ख्यालों में हो
जिसने अपनी ज़िंदगी के
न जाने कितने पल दे दिये तुम्हे …
न जाने कब से!

{कृष्ण बिहारी}

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