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फ़रवरी 13, 2011

फैज़ : मिल जायेगी तारों की आखिरी मंजिल

अविभाजित भारत में सन 1911 के फरवरी माह की 13 तारीख को जन्मे फैज़ अहमद फैज़ की नायाब शायरी का ही जादू है कि उनके भौतिक अस्तित्व से हजारों-लाखों गुना बड़ा कद शायर फैज़ का हो गया है और अच्छा शायर जन्मता तो है पर उसकी रुखसती कभी नहीं होती धरा से। वह जिंदा रहता है लोगों के दिलों में। अच्छा कवि वह लीविंग ओर्गेनिज़्म है जो जब भी स्थितियाँ अनूकूल होती हैं तब वह अपने काव्य की बदौलत जन्म ले लेता है।

फैज़ अहमद फैज़ जैसे शायर जिन्होने मानव जीवन के हर रंग का और हर ढ़ंग का विश्लेषण अपनी शायरी के द्वारा किया हो वे तो हर दिन के हर पल कहीं न कहीं जन्मते ही रहते हैं। मानव जीवन के हर भाव के साथ उनका जुड़ाव रहता है चाहे वह मोहब्बत का क्षेत्र हो या जंग का। बात चाहे मानव के शोषण की हो रही हो या जीवन में मनुष्य की स्वतंत्रता के उत्सव की, फैज़ वहीं मिल जायेंगे अपनी शायरी की बेपनाह खूबसूरती के साथ।

उन्होने केवल किताबी शायरी ही नहीं की वरन मनुष्य की स्वतंत्रता के लिये वास्तविक जीवन में भी तानाशाही सत्ता द्वारा दी गई प्रताड़ना झेल कर भी संघर्ष किये।

मनुष्य ऊपर उठना चाहता है। आदर्श की ओर बढ़ना चाहता है। पर शक्तियाँ हैं जो मनुष्य जीवन को नीचे खींचती हैं और उसका पतन करती हैं। विकासोन्मुखी राहों पर चलते चलते ऐसे पड़ाव आते हैं जब बुराइयों के समावेश के कारण तरह तरह के प्रदुषण तौर तरीकों में आ जाते हैं और निराशा जन्म लेने लगती है। जिन्होने अपने जीवन होम कर दिये मानव जीवन के उत्थान के लिये उन्होने क्या इसलिये किया कि सब फिर से भ्रष्ट माहौल की ओर गिरते चले जायें।

ऐसे माहौल में हमेशा ही उनकी बेहद प्रसिद्ध रचना- सुबह-ए-आज़ादी, की याद बरबस ही ताज़ा हो जाती है और वह रचना पड़ाव पर ठहरे मुसाफिरों को जगाती है कि इस किस्म के औसत को पाने के लिये हमने यात्रा आरम्भ नहीं की थी। यह रचना यात्रियों में बीते हुये का विश्लेषण करके बुराइयों को हटाकर आशा के साथ आगे बढ़ने के लिये प्रेरणा का कार्य करती है। आदर्श को अभी भी एक मंजिल बनाये रखती है।

ये दाग दाग उजाला ये शब गजीदा सहर
वो इंतजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार के मिल जायेगी कहीं न कहीं
फलक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफीना-ए-गम-ए-दिल

भारत और पाकिस्तान के नामचीन फिल्मकारों, संगीतकारों एवम गायकों ने फैज़ की शायरी के साथ अपनी कला का संगम बार बार किया है।

फैज़ जीवित नहीं हैं आज, पर वे उपस्थित हमेशा रहते हैं। उन्हे याद करने की देर है और वे अपने शब्दों का जादू बिखेरने आ जाते हैं।

फैज़ की शायरी की हद नहीं है। बानगी देखनी हो उनकी रचना ’कुत्ते’ में देखी जा सकती है।

बीसवीं सदी का भारतीय उपमहाद्वीप धन्य हो गया फैज़ अहमद फैज़ को अपने यहाँ जन्मा पाकर।

सन 1911 के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मे हरेक मनुष्य के पूर्वज शायर फैज़ अहमद फैज़ के जन्म शताब्दी दिवस पर उन्हे श्रद्धा सुमन!

फ़रवरी 13, 2011

कद बड़ा करता साया

महफ़िल में मुखौटों को आइना दिखा देता है
तमाशा बनता है दीवाना तमाशा बना देता है

किसे मिलता है लहरों से गहराई का सुराग
डूबने वालों को ही समंदर अपना पता देता है

भरे पेटों को दवाओं से भी कब आती है नींद
भूखे को तो रोटी का टुकड़ा भी सुला देता है

आग लगे घरों से तुम्हे क्या पर ये सोच लो
हवा का बदलता रुख बस्ती को जला देता है

अपने साथ पटक लेंगे आये संभाले तो कोई
अब देखना ये है कौन हमको सहारा देता है

शहर की रोशनियों के बीच गुम होने के बाद
हर अंधेरा दरवाज़ा मुझे घर का पता देता है

तजुर्बात की धुनों पर नाचती है हर जिंदगी
वक्त का चलन सबको जीना सिखा देता है

किसी को गिरा सके तो ही आगे बढ़ोगे वरना
उतावली भीड़ में कौन किसको रास्ता देता है

खुद से सामना होता है अंधेरा होने के बाद
उजाले में तो साया भी कद को बढ़ा देता है

इज्ज़त मांगे नहीं मिलती कौन नहीं जानता
पर तू तो यार माटी को सर पे बिठा देता है

तुमने धूप में ही बाल सफ़ेद किये है आलम
वक्त बच्चे को भी दुनियादारी सिखा देता है

(रफत आलम)

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