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फ़रवरी 9, 2011

तबादला

चार दिन गायब रहने के बाद हरेंद्र हॉस्टल वापस आया तो बहुत खुश था। अपने कमरे में जाकर सामान रखने के बाद बाहर आया तो उसके हाथों में मिठाई के डिब्बे थे। मैस में काम करने वाले लड़कों को उसने खाना खाते अपने सभी साथियों को मिठाई देने के लिये कहा और अपने ग्रुप के साथ  बैठ गया।

उसने बताया कि वह अपने घर चला गया था। सूचना आयी थी।

साथियों ने मजाक किया कि शादी वगैरह तो निश्चित नहीं कर दी घर वालों ने।

अरे नहीं।

हरेंद्र आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ा था। कुछ हाथ तंग करके ही उसका माहभर का खर्च निकल पाता था। उसके पिता को आशा थी कि साल-डेढ़ साल में इंजीनियरिंग पूरी करके उसे नौकरी मिल जायेगी तो घर की आर्थिक हालत बेहतर हो जायेगी। साथियों के लिये यह थोड़ा हैरत का विषय था कि वह पूरे हॉस्टल को मिठाई खिलाये। उन्होने अपनी शंका का समाधान चाहा।

तो फिर यह सारे हॉस्टल को मिठाई क्यों बाँटी जा रही है?

अरे यार तुम लोगों से क्या छिपाना। दरअसल पापा का तबादला हो गया है। दस साल से सालों ने ऐसी जगह डाला हुआ था… जहाँ सैलेरी के अलावा कुछ भी कमाई नहीं थी। अब जाकर ऐसी पोस्टिंग मिली है जहाँ पैसा ही पैसा है। पिछले दस साल बहुत परेशानी में बीते हैं हमारे घर के। अब हालात ठीक होंगे। पापा बहुत खुश थे। तबादले के लिये बहुत भागदौड़ की है इन दस सालों में। अब जाकर काम हो पाया है। ऊपर थोड़ा पैसा खिलाना पड़ा पर यह सब तो कुछ ही माह में पूरा हो जायेगा। यह सेक्शन डिपार्टमेंट के सबसे कमाऊ सेक्शंस में आता है। ऐसा मलाईदार तबादला मिला है… मजा आ गया यारों। वारे न्यारे हो जायेंगे अब। सब कसर पूरी हो जायेगी।

हरेंद्र का चेहरा खुशी से लबरेज़ था।

 

…[राकेश]

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