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फ़रवरी 7, 2011

कत्लगाहों की तरफ जाती भेड़ें

प्यादों का फरजी बनना देखा है
गली का हर गुंडा
भाईसाहब बन गया है आज
लालबत्ती की कार से उतर कर
अनगिनत योजनाओं का
शिलान्यास करता नज़र आ रहा है।

कमीशन की चक्की में
सीमेंट मिटटी हो जाता है
अगली ही बरसात में
विकास के नाम पर बने
हज़ारों ताजमहलों का ढ़हना तय है
आयोगों के कफ़न ओढा कर
क़त्ल कर दिए गये सपने
सदा के लिए दफ़न हो जायेगा।

इन्साफ मुजरिमों को सजा नहीं देता
स्विस बैंक ग्राहक का पता नहीं देता
अहसास के टुकड़ा टुकड़ा बंटवारे के बाद
इ.वी.एम मशीन पर बैठा डंडा
अंधेर नगरी का है बादशाह
विदूषक, बहरूपिया, बेईमान, हत्यारा, घूसखोर
सूदखोर, कालाबाजारु, मिलावटिया, रंगदार
नवरत्न
मीडिया, नौकरशाह और न्यायदाता
सलाहकार चौपटराज के।

मदारियों की धुन पर नाचते बंदरों को
बस ध्यान है रोटी के टुकडों का
खेल जारी है
तमाशा बने तमाशाइयों को
मरीचिकाओं से पानी का पता मिलता है
भूखी सो जाती हैं लाखों फुटपाथें
शराब की दुकानों पर
खून पसीने की बेमौत मरती थकन
लहू थूकती बीमार औरत
वासना के कसाईखाने में
कटता मुफलिस हुस्न का गोश्त
पथरा गया आसमान चुप है
प्याज-रोटी की तलाश में
भटकती जिंदगियाँ
जैसे सर झुकाए
कत्लगाहों की तरफ जाती भेड़ें।

(रफत आलम)

चित्र [साभार – Life Magazine] व्यक्तिगत अव्यवसायिक प्रयोग के लिये

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