दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)

खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं

रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं

चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं

मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं

सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं

चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं

महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं

(रफत आलम)

4 टिप्पणियाँ to “दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)”

  1. बेहद ही सुन्दर नज्मों से सजाई है आपने ये गज़ल। आभार।

  2. [सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत / दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं]
    बहुत अच्छी गज़ल है रफत जी,
    धन्यवाद

  3. बहुत खूब. कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं.

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