Archive for फ़रवरी 4th, 2011

फ़रवरी 4, 2011

दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)

खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं

रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं

चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं

मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं

सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं

चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं

महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं

(रफत आलम)

फ़रवरी 4, 2011

सृष्टि सूक्त : महर्षि परमेष्टि

तब न था अभाव और न थी विद्यमानता।
वायु थी न वायु पार अंतरिक्ष का पता।
आवरण पदार्थ कौन? वह स्वयं कहाँ रहा।
किस प्रभाव से गहन अमाप विश्व जल बहा।
और तब न मृत्यु थी, न थी कहीं सुनित्यनता।
थी न तब दिवा-निशीथ की प्रकाश दीप्तिता।
ली स्वयं व्यवस्थ एक ने अवायु श्वास भर।
एक मात्र था वही वहाँ न प्राप्त था अपर।
अंधकार मात्र था प्रथम घनान्धकारमय।
यह समस्त एक अनालोक नीर का प्रलय।
घिरा किसी पदार्थ से न, एक वह कि जो हुआ।
वह प्रभूत ज्वालाशक्त्ति ज्ञात अंततः उठा।
कामना हुई इसी स्वरुप अवतरित प्रथम।
बीज एक था वही सुबुद्धि- ज्ञात आदितम।
साधु जो स्वमन रहे प्रशोधते सुज्ञान से।
जानते, अविद्यमान बद्ध विद्यमान से।
शून्य आरपार तक क्रिया स्वमाप प्रस्सरण
जानते कि उर्ध्व क्या, कि क्या रहा अध: चरण।
बीज तेज से महान शक्त्ति उर्वरा बनी।
थी समर्थता अधः कि उर्ध्व प्रेरणा घनी।
किंतु कौन जानता, समर्थ कौन जो कहे।
था कहाँ समस्त? सृष्टि जन्म कौन विधि गहे।
बाद का बहुत गृहीत जन्म सर्व देव चय।
कौन विज्ञ है कि कौन स्त्रोत सृष्टि का उदय?
जन्म कौन स्त्रोत से समस्त सृष्टि ने लिया
वह, इसे कि रुप उसी ने दिया, नहीं दिया।
वह कि उच्चतम समस्त स्वर्ग से निहारता।
जानता, विचारणीय है कि हो न जानता ।

[ऋग्वेद – x मंडल]

फ़रवरी 4, 2011

प्रलय का दिन दूर नहीं…(रफत आलम)

शाम ढलने से पहले ही
सूरज का रंग लाल होने लगता है
गहराने लगती है
आकाश की सियाही
धुंआं उड़ाते
दुपहियों -कारों- कारखानों से
दिन में ही रात उतर आती है।

अनगिनत पेड़ों की बेआवाज़ कातिल
काले अजगर सी सड़कें
हरियाली निगल रही हैं
खेतों की क्यारियों पर
कंक्रीट जंगल उग गए हैं।

बेतरतीब विकास के कैंसर ने
मासूम फिजा को लील लिया है
ये शहर है या नरक बस रहा है?

मेला आकाश-
नंगे पहाड़-
बंजर धरती-
हवा की घुटती सांस-
जता रहे हैं
चेता रहे हैं
याद दिला रहे हैं
प्रक्रति बहुत सहनशील है
पर बिगड़ने के बाद
एक पल में
समुद्र को मरू बना देती है।

ओ अक्ल के अंधे मानव
डायनासोर  के कंकाल
या गए दिनों की सभ्यताओं के अवशेष
तुझे दीखते नहीं क्या?

याद रख
आज किये की सजा
तेरे कल को ज़रूर भुगतनी पड़ेगी
शायद नवीन प्रलय का दिन
अधिक दूर नहीं

 

(रफत आलम)

[चित्र : साभार नासा]

%d bloggers like this: