Archive for फ़रवरी 2nd, 2011

फ़रवरी 2, 2011

मुल्ला नसरुद्दीन : लंका में सभी बावन गज के

बात उन दिनों की है जब मुल्ला नसरुद्दीन को एक प्रदेश के शिक्षा विभाग ने कुछ समय के लिये इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के पद पर ससम्मान आमंत्रित करके नियुक्त्त किया था और नसरुद्दीन ने देश के विकास में शिक्षा के मह्त्व को देखते हुये यह जिम्मेदारी अपनाने की स्वीकृति दे दी थी। उन्होने शिक्षा विभाग को कहा कि विभाग को सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा के स्तर को सुधारना चाहिये। वे प्रदेश भर के प्राथमिक स्कूलों के दौरे करने लगे। आज यहाँ तो कल वहाँ। साल के किसी दिन अवकाश न था उन्हे।

सारे दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर

उनका तो अटल विश्वास था ’कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत पर। किसी तरह की बाधा उन्हे न रोक पाती।

उसके बाद उन्होने दसवीं और बारहवीं तक के विद्यालयों के दौरे किये। उन्होने अपने इन तूफानी दौरों के दौरान सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, निजी, गरीब और धनी स्कूलों एवम विद्यालयों के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र के कला और विज्ञान को गहराई से खंगाला।

इन यात्राओं से उपजे ज्ञान को देश के चहुँमुखी विकास और इसकी एकता और अखंडता की मजबूती के लिये उपयोग में लाने के लिये उन्होने राज्य सरकार को बेशकीमती सुझावों से भरी रिपोर्ट सौंपी। अगर मुल्ला नसरुद्दीन की रिपोर्ट पहले राज्य और बाद में समूचे देश में लागू हो जाती तो देश की दशा और दिशा ही और होती। पर राजनीतिज्ञों से ऐसी आशा रखनी कि वे विशुद्ध देश हित में कोई काम करेंगे ऐसा है कि जैसे कोई बरसते सावन में बिना छाते के बाहर निकल पड़े और सोचने लगे कि भीगेगा नहीं या कोई शराब का तबियती शौकीन दूरदराज से आती बेग़म अख्तर की आवाज में सुनकर कि

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

हाथ में बड़े बड़े जग आदि लेकर बरसात में खड़े हो जायें और बाद में निराश होकर बरसात को और उस आदमी को गालियाँ दें जो बेग़म की गज़ल सुन रहा था।

मुल्ला नसरुद्दीन की बुनियादी सिफारिशें थीं कि देश के बच्चे देश की जिम्मेदारी हैं और ये बच्चे ही आने वाले भविष्य की दुनिया को संवार सकते हैं और हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने की एक जैसी सुविधा मिलनी चाहिये। अगर प्राथमिक स्कूल के स्तर पर ही बच्चों में धन, जाति और सम्प्रदाय के भेद होने लगेंगे तो यह बात भूल जानी चाहिये कि बड़े होकर वे इन भेदभावों से ऊपर उठ पायेंगे। ऐसा कभी नहीं हो पायेगा और देश के संसाधन, ऊर्जा और विचारशक्त्ति जैसे सभी बहुमूल्य गुण इन झगड़ों से निबटने में ही नष्ट होती रहेंगे और देश और इसके वासी पिछड़े ही रहेंगे।

शिक्षा सरकार का सबसे परम कर्त्तव्य होना चाहिये और सरकार को सबसे अच्छे स्कूल और विद्यालय खुद खोलने चाहिये और देश के सभी बच्चों को उनमें ही पढ़ाया जाये।

प्रदेश सरकार ने मुल्ला नसरुद्दीन की सिफारिशों पर कान न रखे।

सरकारें यदि देशहित में शिक्षा पद्यति लागू कर दें तो शिक्षा के क्षेत्र में घुसपैठ करके लाखों करोड़ रुपये कमा रहे माफियाओं का क्या होगा। समाज खुद नहीं चाहता कि बच्चों से भेदभाव खत्म हो अतः लोग खुद पसंद करते हैं कि आर्थिक, जाति और सम्प्रदाय के आधार पर बने स्कूल और विद्यालयों में ही उनके बच्चे पढ़ें ताकि उनके झूठे अहं बने रहें।

बहरहाल मुल्ला नसरुद्दीन ने जिस काम में अपना समय और अपनी ऊर्जा झौंकी वह प्रयास उस समय तो सफल न हो पाया, हो सकता है कि कभी ऐसा भी देश में हो जाये। आशा का साथ छोड़ना मनुष्य के लिये संभव नहीं।

नसरुद्दीन जीवन के किसी भी क्षेत्र से हास्य की बात खोज ही लेते थे। अपने इन दौरों से जुड़ी बहुत सारी मजेदार बातें वे बताया करते थे और उनमें से बहुत सारी बातें चुटकलों के रुप में प्रसिद्ध हो चुकी हैं। भले ही लोग जानते न हों कि इन चुटकलों की शुरुआत मुल्ला नसरुद्दीन ने ही की थी।

अपने इन दौरों से जुड़ा एक मजेदार वाक्या वे सुनाते थे।

एक बार वे किसी पर्वतीय इलाके में बड़े ही दुर्गम स्थल पर स्थित एक स्कूल का दौरा करने पहुँच गये। उस दूरदराज के स्कूल में कभी कोई अधिकारी नहीं गया था पर मुल्ला तो कवियों एवम रवि से भी ज्यादा कुशल थे और जहाँ रवि और कवि भी न पहुँच पायें वे वहाँ भी पहुँच जाते थे।

नसरुद्दीन तो उस जगह के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गये। प्रकृति ने हर तरफ अपने सौंदर्य का ऐसा जलवा बिखेर रखा था कि आँखें हटती ही न थी। हवा में ऐसी ताजगी थी कि साँस लेने में भी आनंद की अनुभूति होती थी। आंनदविभोर नसरुद्दीन स्कूल में प्रवेश करते ही प्रधानाध्यापक के कक्ष में गये और उन्हे अपना परिचय देते हुये कहा कि वे अकेले ही कक्षाओं का मुआयना करेंगे और अध्यापकों को बताकर परेशान और सचेत न किया जाये।

छोटा सा स्कूल था। नसरुद्दीन कक्षाओं के बाहर से ही अध्यापकों एवम विधार्थियों को आपस में संवाद करते हुये देखते और सुनते रहे। तभी उनकी दृष्टि बाहर मैदान में पेड़ के नीचे बैठे कुछ बच्चों पर पड़ी। वे वहाँ पहुँचे और बच्चों से पूछा कि वे वहाँ क्यों बैठे हैं तो एक बच्चे ने बताया कि यहाँ उनकी अंग्रेजी की क्लास लग रही है।

नसरुद्दीन ने पूछा,” और आपके टीचर कहाँ हैं?”

जी, वे अभी आ जायेंगे। कल गिर गये थे हाथ में फ्रैक्टर हो गया था, उसी के लिये पास के अस्पताल से होकर स्कूल आने को बोल गये थे।

नसरुद्दीन बच्चों से बातें करने लगे।

कुछ देर बाद उन्होने ध्यान दिया कि बच्चे अंग्रेजी शब्दों को उनके मूल उच्चारण के साथ न बोलकर उन्हे उनके लिखने के आधार पर उच्चारित कर रहे हैं। मसलन ’अम्ब्रेला’ को कुछ ’यूम्बरेला’ बोल रहे थे और कुछ ’उम्ब्रेला’, ’स्टडी’ को ’स्टयूडी’ या ’स्टूडी’, ’गोट’ को ’जोट’ बोल रहे थे। अंग्रेजी की वर्णमाला में जो वर्ण जैसा उच्चारित किया जाता है वे शब्दों में भी उसे लगभग वैसा ही बोल रहे थे।

नसरुद्दीन ने सोचा कि टीचर से ही बात करेंगे। सो वे बच्चों से कहने लगे कि यहाँ चारों तरफ कितनी प्राकृतिक सुंदरता फैली हुयी है। उन्होने एक बच्चे से पूछा कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?

’जी नेटूर’

’नेटूर’?

’जी हाँ नेटूर’

’इसकी स्पेलिंग बता सकते हो’?

जी हाँ… एन ए टी य़ू आर इ ।

तब तक टीचर भी हाथ में प्लास्टर चढ़वाये हुये वहाँ आ गये। प्रधानाध्यापक ने उन्हे मुल्ला नसरुद्दीन के दौरे के बारे में बता ही दिया था। आते ही वे नमस्कार करके मुस्कुराते हुये खड़े हो गये।

नसरुद्दीन ने उनका हाल पूछा, हाथ के बारे में पूछा और फिर उसी बच्चे से कहा कि अब फिर से बताये कि प्रकृति को अंग्रेजी में क्या कहते हैं और उस अंग्रेजी शब्द की स्पेलिंग क्या है?

बच्चे ने फिर से दोहरा दिया।

नसरुद्दीन ने टीचर की ओर देखा। टीचर बच्चे की तरफ गर्व से मुस्कुराकर देख रहे थे। शाबास बेटा।

नसरुद्दीन ने दोहराया, एन ए टी य़ू आर इ, इन सबसे मिलकर क्या बना।

सब बच्चों ने समवेत स्वर में नारा लगाया और उनके साथ साथ उनके टीचर ने भी स्वर मिलाया, ” एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर”।

नसरुद्दीन के मस्तक पर पसीने की नमी आ गयी। पर वे अपने भावों पर नियंत्रण कर गये।

अच्छा बच्चों पढ़ाई करो।

टीचर से विदाई लेकर नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक के कक्ष में आ गये। वे कुछ क्रोधित भी थे। उन्होने प्रधानाध्यापक से कहा,” महोदय आपके स्कूल के अंग्रेजी के अध्यापक, कैसी अंग्रेजी बच्चों को पढ़ा रहे हैं।”

अच्छी अंग्रेजी पढ़ाते हैं श्रीमान।

कैसी अंग्रेजी पढ़ाते हैं, वे बच्चों को शब्दों का सही उच्चारण भी नहीं सिखाते। एन ए टी य़ू आर इ, नेटूर, पढ़ाते हैं। इच्छा तो हो रही है कि उनकी शिकायत लिखूँ।

प्रधानाध्यापक निवेदन करने लगे,” नहीं श्रीमान ऐसा न करें, घर में अकेला कमाने वाला है। बेचारे का फुटूर बिगड़ जायेगा”।

’फुटूर’ सुनकर तो नसरुद्दीन प्रधानाध्यापक का चेहरा देखते रह गये।

वहाँ सुधार का प्रबंध तो उन्होने किया ही। बाद में जब वे यह किस्सा सुनाते थे तो कहते थे कि इसलिये कहा जाता है कि लंका में सभी बावन गज के।

…[राकेश]

%d bloggers like this: