Archive for फ़रवरी 1st, 2011

फ़रवरी 1, 2011

मिस्र जल उठा : आँच से हिंद जैसे नींद से जागेंगे क्या? (रफत आलम)

नंगे पैरों की आहटें
महलों को सुनाई देने लगी हैं
आज की रात
वियाग्रा से भी
रंगीन नहीं हो पायेगी
तानाशाह की महफिल।

भूखी आवाजों का शोर
गोलियों की तड़-तड़ से दब गया है अभी
नंगों की लाशें शाहराहों पर बिखरी पड़ी हैं
उजाले के तलिस्म से बहला कर
कल कोई नया काला सूरज
तख़्त पर जा बैठ सकता है
जो भी हो
वक्त  की किताब में लिखा है
अँधेरी धूप का सफर
भूखे पेटों के नाम।

सोने की चिड़िया की बात
बिलकुल ही अलग है
इसके तो सभी पर
बाँट कर
गंदमैले रंगों में बाँध दिए गए हैं
कैसे उड़े बेचारी
आकाश की ओर देखने का
हौसला तक भूल चुकी है।

हिंदू- मुसलमान के बीच खाई
सदियों के लुटेरे खोद गए थे
आज के पांचसाला डाकुओं ने
मंडल-कमंडल की कलोरोफॉर्म देकर
अक्ल ओ होश को सुला दिया है
भूखे- नंगों में
रोटी कपडा मकान की सोच
जागने ही नहीं देते सफेदपोश।

चुनाव आने से पहले ही
संवेदनाओं के भूतों को उठा देते हैं
नाच शुरू हो जाता है
क़त्ल ओ गारत का
मंदिर –मस्जिद
स्वर्ण –दलित
अगडे-पिछड़े
पेट पर पत्थर बांधने वाले
कभी न टूटने वाली नींद में
विषैले नारों से सुर मिला कर
मजबूती से थाम लेते हैं
अपने ही खून से लथपथ तख़्त
रोटी नहीं लाखों तवों पर
तो क्या?

जिंदाबाद !
हमारी कौम के बादशाह
खून-पसीने की भट्टी में
पक रही हैं सोने की ईटें
काले धन से लॉकर्स अटे पड़े हैं
स्विस बैंकों का कारोबार जारी है
नीरो की बंसी जो नहीं सुनते
जिंदा जला दिये जाते हैं
या बेजुबान किये जाकर
जंजीरों की सदाएं सुन रहे है।

फिर भी सोच की जिद है
नन्हा जुगनू जन्मेगा कभी गोबर में
रौशनी का पुंज बन कर
भूख के सियाह बंटवारे की रेखाएँ मिटा देगा
एक होकर तन उठेगी शोषितों की मुट्ठिया
नए इन्कलाब की मशालें
पसीने की हर बूँद की कीमत मांगेंगी
लहू का हर कतरा अपना हिसाब लेगा
नामुमकिन है ऐसा होना
क्या कभी ऐसा होगा?

(रफत आलम)

फ़रवरी 1, 2011

आज के अखबार में क्या लिखा जाये? (कृष्ण बिहारी)

 

आज कराहे नहीं आदमी
चीखीं नहीं दुलहनें
चिल्लाई नहीं औरतें
मिस वर्ल्ड आदि भी बिना बाधा के हो गये सम्पन्न।
मकबूल फिदा हुसैन ने भी
आज नहीं बनाया कोई चित्र
बताओ, कल के लिये –
आज के अखबार में क्या लिखा जाये!

नायिकाओं की देह भी तो खाली नहीं बची
सौम्य प्यार से लेकर
सांड का बलात्कार तक तो
दिख गया।
सैंकड़ों कोणों से बने चित्र
त्रिकोण भी तो नहीं छूटा
जो खतरे का लाल निशान
दिखाता है एक चेतावनी के साथ।
कौन जाने किसी दूसरे के नम्बर वन
होने के बाद फिर बनें कुछ चित्र
या फिर एक सीरिज़ ही बने।
लेकिन अब तक तो किसी ने दावा भी नहीं किया
नम्बर वन होने क
ऐसे में क्या किया जाये
बताओ, कल के लिये –
आज के अखबार में क्या लिखा जाये!

स्टॉक एक्सचेंज में
न कुछ चढ़ा न कुछ गिरा
यहाँ तक कि कोई
धमाका भी नहीं हुआ
न धूल न धुआँ
मुम्बई में ऐसा सन्नाटा
पहले तो कभी नहीं हुआ।

न जाने क्यों छोटा नायक
बड़ा नायक आपस में नहीं लड़े
आखिर, सुर्खियों को आज कौन सा
रंग दिया जाये।
बताओ, कल के लिये –
आज के अखबार में क्या लिखा जाये!

राजस्थान में कोई औरत
सती भी न हुई
किसी ने कहीं संथरा भी न लिया
किसी मंत्री के बिस्तर के नीचे से भी
निकला नहीं एक रुपया
खेल के मैदान से खिलाड़ी भी
भगाये नहीं गये
अपनी ही पुत्रवधू के साथ
जबरदस्ती करने के लिये
तेरह बलात्कारी बुलाये नहीं गये।

यह तो बहुत बड़ी
निष्क्रियता का सूचक है
जगत की इस उदासीनता के प्रति
क्या किया जाये।
बताओ, कल के लिये –
आज के अखबार में क्या लिखा जाये!

नेताओं में समझौता भी नहीं हुआ
एक सबसे बड़ा प्रदेश देश का
इंद्रजाल के सम्मोहन में है
और पूरा देश आर्थिक दोहन में है।
लेकिन, कहीं से कोई समाचार नहीं है।
बताओ, कल के लिये –
आज के अखबार में क्या लिखा जाये!

{कृष्ण बिहारी}

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