अँधेरे का इतिहास नहीं होता…(रफत आलम)

सच के तराज़ू का कोई बाट कयास नहीं होता
वज़न का पैमाना मगर झूठ के पास नहीं होता

कब से चाँद तारों के बीच ढूँढ रहा हूँ अपना नाम
मुझको कौन समझाए अँधेरे का इतिहास नहीं होता

शीशे से पत्थर बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा
बहुरूपियों के बीच भी अब दिल उदास नहीं होता

कहकहों के बीच भी सुना जायेगा रुदन भरा गीत
नाउम्मीद तो हूँ बहुत मगर बे-आस नहीं होता

एक वक्त था बेचेन हो जाता था उसको देखे बिना
वक्त ये भी के वो पास है और अहसास नहीं होता

चुप करने के लिए छुरियां दिखा रहे हैं यार लोग
जबान रोज कटती है मेरी और अहसास नहीं होता

रोज मर्सिहा सुना कर जा रहे हैं सब अपने प्यारे
जिंदा भी हूँ के नहीं कई बार विश्वास नहीं होता

गए दिनों की सदाओं को अब भी है मेरी तलाश
लोगों तुम्हारी इन अफवाहों पर विश्वास नहीं होता

तन्हाई में बच के रहना गए दिनों की यादों से
ये आसेब आते ही हैं जब कोई आसपास नहीं होता

साँस बन के समा चुका है दिल की धडकनों में
वह इतना नज़दीक है के और पास नहीं होता

(रफत आलम)

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4 टिप्पणियाँ to “अँधेरे का इतिहास नहीं होता…(रफत आलम)”

  1. har sher khubsurat dad ke quabil mubarak ho

  2. सुनील कुमार जी शुक्रगुजार हूँ आपका .

  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (31/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

  4. मोहतरमा वंदना जी ,तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ तवज्जोह देने के लिये .आपकी होसलाअफजाही से लिखने की प्रेरणा मिलती है.

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