औरत…(कृष्ण बिहारी)

औरत को मारो पीटो
दहलाओ उसके सुख-दुख
हारी-बीमारी
और हाँ-ना से
कोई सरोकार न रखो
मौका मिलते ही उसे
जांघ के नीचे दबाओ
या फिर उसके
नितम्बों पर चढ़ जाओ
और जंगलीपन दिखाओ।

उसे पत्नी होने का दर्जा
हकीकत में मत दो
उसके आगे वायदों की
बिसात बिछाओ
वरना वह चढ़ जायेगी तुम पर
कर देगी तुम्हारा कद कमतर।

औरत को सताने की शुरुआत
तुम थोड़े ही कर रहे हो
जो तुम्हारे बाप ने किया
तुम्हारी माँ के साथ
वही तुम करो
अपने बेटे की माँ के साथ।

बेटी होने पर
मुँह फुलाओ
बेटा होने पर फुसलाओ
किसी भी बहाने से
उसे फिर से
गर्भिणी बनाओ।

तुम्हारा बाप
तुम और तुम्हारा बेटा
तीनों ही वास्तव में मर्द हो
जिनको पैदा करने की
बहुत बड़ी भूल की है औरत ने
चुकाने दो उसे कीमत
और वसूलो सूद
महाजन बनकर।

दिन में उसे हड़काओ-धमकाओ
रात को उसके लंहगे में गिड़गिड़ाओ
अपनी मर्दागिनी बहाओ।

औरत को निकलने मत दो बाहर
हाथ से निकल जायेगी
करने मत दो किसी से प्रेम
बदल जायेगी
उसे अपनी जरुरत पर
बाहर लाओ
व्यक्तिगत लाभ के लिये
नंगा घुमाओ
उसकी कमाई खाओ।

शरमाने की क्या बात है
शरम कोई हवा का झौंका नहीं है
वह कहीं नहीं जायेगी
मर भी गई तो
तुम्हारे पास दूसरी आयेगी
अकालों के बावजूद
औरतों का टोटा नहीं है।

औरत को इशारों पर
नचाओ
घर में रंग रुप और
सलीके के न होने का आरोप लगाओ
दहेज कम लाने का ढ़ोल बजाओ
सड़क पर, संसद में
उसे मोहरा बनाओ
मंच पर फेंको कुछ सिक्के
खनखनाओ
उसकी देह से बरसेगा सोना
दोनों हाथों से लूटो और कमाओ।

सिनेमा का परदा हो या
विश्व-बंदरियों का जमावड़ा
जिसे पता न हो अपने सौन्दर्य का
उसे खूबसूरत बताओ
उसके अहम को तुष्ट करो
उसे चूतिया बनाओ
और अपना मन बहलाओ।

शास्त्रों और पुराणों में
सत्य वचन
वह तुम्हारे मन बहलाव के लिये बनी है
इसलिये
औरत होने के जुर्म से सनी है।

{कृष्ण बिहारी}

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7 टिप्पणियाँ to “औरत…(कृष्ण बिहारी)”

  1. औरत और मर्द के बीच गहरी होती खाई.

  2. एक दर्दनाक हकीकत ।

  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (24/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

  4. जिन्दगी की कड़वी हकीकत…

  5. औरत को रौंद कर , तिरस्कृत कर पुरुष ऊर्जान्वित महसूस करता है शायद।

  6. स्थितियां सुधर रही हैं… मानसिकता भी..
    नारी इस उस उत्पीडन के लिए इतनी अनुकूलित हो गयी है कि उसे इसमें कुछ भी असामान्य नहीं दिखता..
    पहला कदम उसे उठाना होगा..
    क्रोध और बेचैनी टपक रही है कविता से….

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