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जनवरी 22, 2011

गूँगों की बस्ती में नक्कारखाने में बजती तूती…(रफत आलम)

सफर काँटों का है चल सको तो साथ आओ
जिंदगी के रास्ते में सिर्फ बेल-बूंटे ही नहीं हैं
जल्दी क्या है हमदर्दो नमक भी ले आना
पक गए हैं दिल के छाले अभी फूटे नहीं हैं
* * *

फूलों की तरफ क्या सोच कर बढ़ाया था हाथ
काँटों का ऊँगलियों में चुभ जाना बेसबब नहीं
नासमझ हाथों से छूटी थी बहते हुए पानी में
कागज की किश्ती का डूब जाना अजब नहीं
* * *

मैंने अपने दिल पर हाथ रख की थी बात
तुम भी दिल पर हाथ रख कर जवाब लो
मुझको मिल गया जवाब जैसा भी मिला है
तुम भी अपने दिल की बात ध्यान से सुनो
* * *

गूंगों की बस्ती में होंठ हिलाना भी है गुनाह
जो हो रहा है होने दो कुछ न कहो चुप रहो
तूतियों की कब सुनी गयी है नक्कारखानों में
शोर में शामिल होने से बेहतर है कुछ न कहो
* * *

जान लता में है तो लचकती है ए दोस्त
सूखी  हुई शाख ही अकड़ती है ए दोस्त
पर अकडन नहीं है जो के स्वाभिमान है
जिंदगी यूँही कब खुद से लड़ती है ए दोस्त
* * *

सिखाया जाता है हमें झुकना ए दोस्त
फिर क्यों आ जाता है बकना ए दोस्त
क्यों चल देते हैं लोग सूलियों के साथ
कठिन कब था घर में छुपना ए दोस्त
* * *

सर जो झुका था आज भी झुका है
क्या पता अपनी सोच पर शर्मिंदा है
लोग कर रहे  हैं अंजाम की बाते
आगाज़ का भी जिन्हें नहीं पता है
* * *

कहकहों की महफ़िल में आंसुओं की बात गुनाह
दबाई गयी कुचल गयी आरज़ूओं की बात गुनाह
ये कहना अज़ाब के ज़ख्मों को भी देखलो यारो
नवेली पोशाकों के बीच रफुओं की बात गुनाह

(रफत आलम)

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