Archive for जनवरी 20th, 2011

जनवरी 20, 2011

आसमान आदमी का कहाँ था…(रफत आलम)

कुछ सवालों का जवाब
जब कही नहीं मिलता
अक्ल, सोच और मोटी मोटी किताबें
कयास में सच बांचने लगते हैं
धरती के तलिस्म का तोड़
आसमान पर खोजा जाने लगता है
चींटी के पगों की सदा सुनने वाला
आदमी की कब सुनता है?
न प्रार्थना न पुकार!

धर्म- युद्ध
क्रूसेड
जिहाद
गुलामी
आदमी द्वारा आदमी पर
पैशाचिक-ज़ुल्म की अनंत दस्ताने हैं!

विजयी फौजों के बूटों तले
ठोकरों में आते रहे है
मंदिर मस्जिद गिरजे
जाने किसका आसमान सच्चा है
वक्त के साथ बस
ज़ुल्म ओ सितम की ध्वजाओं का रंग बदलता है

आसमान आदमी का कहाँ था
जब
मिटटी के नाम साँसे लिखी गयी
एक कदम बहकने की सजा
नामालूम सफर ने भुगती है
नातमाम है रास्ता
पहला साथी शैतान साथ है

आसमान आदमी का कहाँ था
जब
आसान शिकार की तलाश में
कमज़ोर का कच्चा गोश्त खाकर
ताकतवर ने
वक्त का खुदा बनने का हुनर सीखा था

मानव सिरों पर तख़्त बिछा कर
शाह – तानाशाह  बैठ गए थे
अनगिनत बेबस इंसान
ठूंस दिए गए थे गैसचेंबरों में
बादलों के उपर से
हिरोशिमा पर कयामत उतरी थी
विकलांग नस्ले अब भी पूछ रही हैं
आसमान किसका है…

कल ही इंसानियत को रोते देखा है
पांच लाख मय्यतों पर
बमों की बारिश से
कत्लगाह बना है एक देश
पर कहीं से फरिश्तों की फोज नहीं आई
इन्साफ लेकर
कलियुग में ये भी इमकान नहीं
पैगंबर, कोई अवतार मरहम लेकर आएगा

आसमान आदमी का कहाँ था
जब
कोड़ों के फुंकार पर
उठ खड़े हुए पिरामिड, ताज…
कटे हुए हाथों
उतारी गयी मानव त्वचा के
करुण रुदन से

महलों पर कभी बिजली नहीं गिरी
बैलों की जगह जुतीं झोपडियों
प्यासे खेतों को लहू पसीना पिलाते
मेला ढोते, बेगार करते इंसानों को
दुआओं से भी महरूम रखा गया
कंकर पत्थर की बनी इबादतगाहों की तरफ
देखना भी गुनाह था

अंधेरे में धकेल दी गयी कौमें
हुक्मों –आदेशों –फतवों की गिरवी
इलम ओ हुनर से महरूम नस्लें
फुटपाथ के गहने
झुग्गियों की सड़न
भूखी कांपती जिंदा लाशें
जिंदगी की ये अभिशिप्त सदायें
वक्त के दरवाज़े पर हाथ फैलाए खड़ी हैं
इनका कोई आसमान नहीं है

(रफत आलम)

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