गुरु

किसी कारण दोनों लड़कों का मूड ऑफ था। दोनों ही अपने अपने विचारों में खोये हुये पैदल चलते रहे। बाहर से खामोश थे पर दोनों के ही अंदर तरह तरह के विचार उमड़ रहे थे।

जब उनकी तन्द्रा भंग हुयी तो वे कालेज से दूर चिड़ियाघर तक आ चुके थे। उन्होने सड़क किनारे खड़े फलों के ठेलेवाले से केले खरीदे और चिड़ियाघर की ओर सड़क किनारे बनी रेलिंग पर बैठकर केले खाते हुये इधर-उधर आते जाते लोगों को देखने लगे।

कुछ समय बाद उनका मूड कुछ ठीक हुआ तो एक लड़के ने कहा,” चलो यार हॉस्टल चला जाये”।

उन्होने सामने से गुजरते हुये एक अधेड़ उम्र के रिक्शे वाले को आवाज देकर रोका,” क्यों भैया, गुरुदेव पैलेस के पास चलोगे क्या”।

“चलेंगे, बाबू भैया, दस रुपये लगेंगे”।

“चलो”।

दोनों लड़के रिक्शा में बैठ गये। रिक्शा चली तो चलती हवा सुहानी प्रतीत हुयी।

अक्टूबर के माह में बादलों भरा दिन अच्छा लग रहा था। लड़कों का मूड दुरुस्त हो चला था।

रिक्शा चिड़ियाघर के सामने वाली सड़क से गुरुदेव पैलेस जाने वाली सड़क पर मुड़ने लगी तो पहले से उस मुख्य सड़क पर चल रही एक रिक्शा उनके सामने से गुजरी। रिक्शा चालक एक जवान युवक था और रिक्शे में दो लड़कियाँ बैठी हुयी थीं और आपस में हंसी ठिठोली करने में व्यस्त थीं।

पहले कभी भी लड़कियों को देखकर छींटाकशी न करने वाले लड़कों को न जाने आज क्या चंचलता सूझी कि एक लड़के ने सीटी बजा दी। सीटी तेज नहीं बजायी गयी थी पर इतनी हल्की भी नहीं थी कि आगे चल रही रिक्शे में बैठी लड़कियां न सुन पायें।

सीटी की आवाज सुनकर लड़कियों ने पीछे मुड़कर देखा और वापस हंसते हुये अपनी बातों में मशगूल हो गयीं।

लड़कों पर आज असामान्य व्यवहार हावी था।

एक लड़के ने रिक्शे वाले से कहा,” भैया, ज़रा तेज चलाओ, उस आगे वाले रिक्शे के बराबर में ले चलो”।

रिक्शे वाले ने कहा,” बाबू भैया, एक बात कहूँ”।

“हाँ, कहो”।

“आप लोग भले घरों के हो। अच्छे पढ़े लिखे हो। कल को बड़े आदमी बनोगे। ये सब छोटी हरकतें आपको शोभा नहीं देतीं।”

लड़कों को चुप पाकर रिक्शे वाले ने आगे कहा,” आप लोगों के पिता, चाचा वगैरहा मेरी ही उम्र के होंगे। उसी बुजुर्गियत के नाते कह रहा हूँ। और अपने जीवन के अनुभव से कहता हूँ बेटा कि समय बहुत बड़ा न्याय करने वाला होता है। यह सूद समेत वापस करता है। आज आप किसी की बेटी को छेड़ोगे, कल कोई आपकी बेटी को छेड़ेगा। समय ऐसा करेगा ही करेगा।”

रिक्शे वाले की नसीहत सुनकर लड़कों की सोच, जो इधर-उधर हिल गयी थी वापस अपनी नैसर्गिक स्थिति में आ गयी। वे भीतर ही भीतर शर्मिंदा महसूस करने लगे।

रिक्शे वाले ने कहा,” आप भले लगे इसलिये कह देने की इच्छा हो गयी।”

“आपने ठीक कहा, शुक्रिया”। लड़कों ने कहा।

उनका हॉस्टल भी आ गया था। वे रिक्शे से उतर गये। उन्होने रिक्शे वाले को पचास का नोट दिया। उसके पास खुले नहीं थे, लड़कों ने कहा कि फिर किसी और दिन हिसाब हो जायेगा।

हॉस्टल की ओर बढ़ते हुये एक लड़के ने अपने साथी से कहा,” यार, ज़िंदगी पता नहीं कैसे कैसे सिखा देती है और कहीं से भी गुरु ले आती है शिक्षा देने के लिये”।

…[राकेश]

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8 टिप्पणियाँ to “गुरु”

  1. बिल्कुल सही कहा तभी तो कहा गया है शिक्षा तो नीच से भी मिले तो ग्रहण कर लेनी चाहिये।

  2. बात को कहने में बरता गया धीरज, नसीहत के मुआफिक है.

  3. सुब्रमणियन जी,

    साभार धन्यवाद

  4. राकेश जी ,बहुत प्रेरक कथा साधारण सी बात से चल कर गहरा असर पैदा करती है…. ज़िंदगी पता नहीं कैसे कैसे सिखा देती है और कहीं से भी गुरु ले आती है शिक्षा देने के लिये,अक्षरत सच है रोज तजुर्बों से भी आदमी बहुत कुछ सीख सकता है ज़रूरी नहीं कोई गुरु हो रिक्श वाला बेहतरीन उदहारण है है इस कथा में .शुक्रिया

  5. धन्यवाद रफत जी,
    तजुर्बे की आँच से तपे लोग, जो तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली से नहीं गुजर पाते, भी अनुभव से शिक्षाप्रद ज्ञान बाँट देते हैं। ज्ञान लेने-देने की कोई सीमा नहीं।

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