Archive for जनवरी 13th, 2011

जनवरी 13, 2011

पात्रता और वाणी का संयम …(संत सिद्धार्थ)

बहुत समय पहले की बात है। देवताओं ने एक व्यक्त्ति की प्रार्थनाओं से परेशान होकर मुख्य देवता से कहा,” देव, यह व्यक्त्ति बिल्कुल भी वर देने योग्य नहीं है परंतु यह लगातार प्रार्थना कर रहा है सो अब इसे टाला भी नहीं जा सकता। इसके साथ दिक्कत यह है कि यह वर पाने के बाद उसका दुरुपयोग कर सकता है”।

मुख्य देव ने कुछ देर प्रार्थनारत व्यक्त्ति के बारे में विचारा और कहा,” घबराने की बात नहीं है इसे वर दे दो”।

देवताओं ने उस व्यक्त्ति से कुछ माँगने को कहा।

व्यक्त्ति ने तीन इच्छायें पूरी करने के लिये वर देने की माँग की।

देवताओं ने उसे अंडे जैसे नाजुक तीन गोले दे दिये और कहा,” जब भी तुम्हे अपनी इच्छा की पूर्ती करनी हो, एक गोले को जमीन पर गिराकर फोड़ देना और जो भी चाहो माँग लेना। तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायेगी। ध्यान रखना कि एक गोला सिर्फ एक ही बार काम करेगा अतः सोच समझकर ही इन्हे उपयोग में लाना”।

व्यक्त्ति को तो जैसे सारा जहाँ मिल गया वह खुशी और उत्साह से भागता हुआ घर पहुँचा।

वह तुरंत अपने कमरे में जाकर वर माँगना चाहता था। वह कमरे में घुस ही रहा था कि उसका छोटा सा बेटा भागकर आया और उससे लिपट गया। इस अचानक हमले से व्यक्त्ति के हाथों का संतुलन बिगड़ गया और एक गोला नीचे गिर कर फूट गया। उसके क्रोध का ठिकाना न रहा और उसने क्रोधित होकर बेटे को डपटा,”तेरी आँखें नहीं हैं”।

व्यक्त्ति पर यह देखकर गाज गिर गयी कि इतना कहते ही उसके बेटे के चेहरे से दोनों आँखें गायब हो गयीं।

व्यक्त्ति तो जैसे आसमान से गिरा। वह रोने लगा। उसे बाकी दोनों गोले याद आये।

उसने एक और गोला अपने हाथ में लिया और आँखें बंद करके गोला जमीन पर गिराकर फोड़ दिया और माँगा,” मेरे बेटे के चेहरे पर आँखें लग जायें”।

उसने आँखें खोलीं तो यह देखकर वह आश्चर्य और दुख से भर गया कि उसके बेटे के सारे चेहरे पर आँखें ही आँखें लग गयीं थीं और वह विचित्र लग रहा था। अब व्यक्त्ति को माँगने में गलती करने का अहसास होने लगा।

मरता क्या न करता। उसने तीसरा गोला भी फोड़ा और माँगा कि उसके बेटे का चेहरा सामान्य हो जाये और पहले की तरह केवल दो ही आँखें सामान्य तरीके से उसके चेहरे पर रहें।

इस तरह से उसके कमाये गये तीनों वर बेकार हो गये।

पात्रता और वाणी का संयम दोनों बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं जीवन में।

पात्रता कमायें और कदापि भी न अनर्गल बोलें न विचारें।

Advertisements
जनवरी 13, 2011

अछूत

कुंवर,

अछूत बने बिना कैसे समझोगे? खुद पर जब तक न बीते कोई मानव, पीड़ा समझता ही नहीं। अब बन जाओगे तो खुद ही समझ जाओगे। पीढ़ियों से चली आ रही बीमारी को तुम ही खत्म करोगे। मेरे द्वारा ही तुम्हारा तर्पण होना था। आज मैं तुम्हे मुक्त्ति देती हूँ। अब तुम ज्यादा लम्बे समय तक ऐसी शापित ज़िंदगी नहीं जियोगे।

कैसे?

शीघ्र ही तुम्हे पता चल जायेगा!

तुम्हारे लिये मैं अछूत बिरादरी की  एक कड़ी मात्र ही रही। मेरी बिरादरी के साये से भी तुम्हारी बिरादरी के लोग घृणा करते रहे हैं और तुम भी बहुत अलग नहीं थे उन सबसे।

मेरी माँ, उससे पहले उसकी माँ और उससे पहले उसकी माँ और उससे भी पहले उसकी माँ ने यही सब सहा होगा। जाने कितनी सदियों से यही सब चलता आ रहा है। इन अछूत औरतों के बेटों, भाइयों, और पतियों को तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने घृणा दी पर तुम लोगों की देह के लालच ने इन औरतों को सदा भोगा। बिस्तर में तुम्हे ये औरतें अछूत न लगीं कभी भी?

मेरी देह की बहुत चाह रही है तुम्हे। दिन में कभी भी खेतों पर न जाने वाले तुम राजकुंवर कैसे रात को ट्यूबवैल पर सोने आ जाते थे ताकि सुबह होने से कुछ पहले ही मुझे अपनी अंकशायिनी बना सकने का आनंद ले सको। याद है तुम्हे पहली बार तुमने मेरे साथ जबरदस्ती की थी।

आठवीं तक तो तुम मेरे साथ ही पढ़े थे, कैसे तुम ऐसा कर सके?

मैं कमजोर नारी कैसे तुम्हारा मुकाबला करती?

तब से सालों साल तुमने और तुम्हारे शक्त्तिशाली भाई-बंधुओं ने मेरी देह को ही नहीं भोगा है बल्कि मेरी आत्मा को भी कुचला है।  कमजोर औरतों को तुम शक्त्तिशाली लोग वेश्या बना डालते हो।

तुम्हे तो गुमान भी न होगा कि मेरी देह ने तुम्हे अंतिम सुख दे दिया है।

ऐसा कैसे?

चिंता न करो सरकार तुम्हे जल्दी ही पता चल जायेगा!

तुम्हे याद होगा कुछ समय पहले मैं इक्कीस दिनों के लिये गायब हो गयी थी। उन इक्कीस दिनों ने मेरी ज़िंदगी ही बदल दी। उन्ही दिनों किसी क्षण चेतना ने मेरे अंदर अँगड़ाई लेनी शुरु की थी। इस चेतना के जगते ही एक मकसद मिल गया जीवन में। पर इस चेतना से पहले एक ऐसे सत्य का सामना करना पड़ा जिसने मुझे पूरा हिला दिया था। सत्य जानते ही पहले तो मेरे सामने अंधेरा छा गया था पर बाद में इसी सत्य ने मुझे शक्त्ति भी दी।

वैसे भी मेरा जीवन था ही क्या ऐसे समाज में जहाँ छुआछूत ने लाखों लोगों का जीवन नर्क बना रखा है?

एक तरफ मैं एक अछूत बिरादरी की महिला थी और दूसरी तरफ महिला होने के नाते तुम लोगों ने मुझे वेश्या सरीखा जीवन जीने के लिये विवश कर रखा था। ऐसा जीवन जीता मनुष्य अपनी आयु न भी पूरी कर पाये तो क्या है?

खैर मैं वापिस आयी और पिछले एक माह में हर रात तुमने मेरे साथ ही गुजारी है।

सच जानने के बाद तुम्हे लगेगा कि मैंने तुम्हे ही क्यों छांटा?

कुछ तो संयोग और कुछ मुझे तुम्हारे अंदर और शोषकों से ज्यादा संभावनायें दिखायीं दीं। तुम कवितायें लिखते हो। मुझे लगा कि तुम्हारे अंदर परिवर्तन आ सकता है। बाकी तो आदमी के रुप में हिंसक जानवर सरीखे ही हैं।

मेरे पास ज्यादा वक्त्त नहीं है। तुम्हारे पास भी नहीं रह पायेगा पर जितना भी समय तुम्हे मिल पाये, कोशिश करना कि समाज से छुआछुत की बीमारी को खत्म करने की दिशा में कुछ काम कर सको।

तुम क्यों ऐसा करोगे? यही प्रश्न तुम्हे खा रहा होगा। पर तुम्हे ऐसा करना पडेगा क्योंकि तुम्हारे दोगले, लुके छिपे समाज में तुम्हे भी शीघ्र ही एक अछूत का दर्जा मिलने वाला है। जो लोग आज तुम्हारे साथ उठते बैठते हैं वही लोग तुम्हारे साये से भी दूर भागेंगे। तुम्हे दूर से गालियाँ दी जायेंगीं। तुम्हारे जैसा ही जीवन जी रहे लोग भी तुम्हे गालियाँ देंगे, कोसेंगे। शायद तुम्हारा परिवार भी तुम्हे छोड़ दे।

इन सब मानसिक प्रताड़नाओं से गुजर कर शायद तुम अछूतों की पीड़ा को समझ पाओ। कवि कहते हो अपने को पर कविता का मर्म तुम तभी समझ पाओगे। कुछ करना अछूत समस्या के लिये। तुम्हे एक मौका मिलेगा जीवन में कुछ खूबसूरती लाने का। आशा है इस मौके को गंवाओगे नहीं।

कुंवर साहब, तुम मुझे गालियाँ दे रहे होगे कि मैं ये क्या आयें-बायें बक रही हूँ पर मैंने जो कुछ भी लिखा है उसका एक एक शब्द सच्चा है।

तुम्हे ज्यादा रहस्य में नहीं रखूँगी। डाक्टर ने उस दिन मुझे बताया कि मुझे जानलेवा बीमारी एडस हो गयी है और मेरे पास मुश्किल से एक-दो साल ही बाकी हैं तो मैं गश खाकर गिर पड़ी थी पर मज़े की बात देखो इस बीमारी के सत्य ने मेरी आत्मा को उठा दिया।

मेरी देह को पाकर तुमने अपनी देह को मेरी देह जैसा ही बना लिया है। आज तुम्हे इस बात का पता नहीं है पर देर सबेर तुम्हे इस बात की जानकारी हो ही जायेगी। मुझे कोसने से कुछ नहीं होगा। अछूत समस्या पर मैंने जो लिखा उस पर सोचने की कोशिश करो शायद तुम्हारे नाकारा जीवन को उद्देश्य मिल जाये।

जब सारे बाहरी और अंदर के द्वंदों से गुज़र कर तुम्हारा मानस शांत और शुद्ध हो जायेगा तब शायद तुम मुझे अपना गुरु मानो।

मैंने तुम्हारी देह को मुक्त्ति देने की प्रक्रिया शुरु कर दी है, अपनी आत्मा की मुक्त्ति की कोशिश तुम्हे खुद ही करनी है।

आम्रपाली
11 दिसम्बर 1993

 

…[राकेश]

%d bloggers like this: