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जनवरी 11, 2011

वो कविता … (कृष्ण बिहारी)

 

मैंने सोचा है कि आये जब वह मेरे सामने तो
दूँ मैं उसे एक कविता|

वो कविता
जो उसकी तरह ही खूबसूरत हो।

वो कविता
जो मैंने कागज पर नहीं उसकी खूबसूरती पर
अपने हृदय की धड़कनों से
साँसों की महकती स्याही में डूबकर लिखी हो।

वो कविता
जो कोरे कैनवास की तरह कोरी हो
और मेरे चिरंतन प्रेम की तरह हो
शाश्वत
सार्वभौम।

वो कविता
जो प्रकृति की तरह हो बंधनों से परे
और आत्मानुशासन में मचले
जो बनाये इतिहास
जो होठों पर आये तो लगे कि उसके होठों का शहद
प्रेम की चाशनी को और लबरेज़ कर गया है।

वो कविता
जिसमें एक सादा सी हरकत को जिस्म की झील में उतरने का मौका मिले
जो बनाये गोले लहरों के ज़िंदगी में मेरी।

वो कविता
जो पहचानती हो उसकी खुशबू
और बयान करती हो
उन खुशबुओं और उन हवाओं का रुख
जो जा रही हों उसकी जुल्फों की ओर
जहाँ से उतरेंगी वे उसकी मुस्कानों पर…
वो कविता कब लिखूँगा मैं ?

{कृष्ण बिहारी}

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