शब्द … (कविता – रफत आलम)

 

ढ़ाई अक्षर का छोटा सा नाम
फैले तो सागर- सहरा बन जाये
यानि दुनिया बन जाये

सच्चा शब्द…

आसमानी किताब बन के उतरे
अवतार-पैगम्बर के होठों पर
कुरान-गीता बन जाये
किसी सोच में मग्न कलम से
कालजयी रचना बन जाये
सामवेद होकर सच्चा शब्द
सितार-वीणा बन जाये
जुल्म-अन्याय के विरुद्ध
इन्कलाब की ध्वजा बन जाये

झूठा शब्द…

अज्ञान –अधर्म का विधाता
महाभारत –कलिंग जन्माता
बारूदी ढेरों पर नाचने लगता है
मीन-काम्फ उभारने लगता है
सौ झूठ को सच बनाता है
हिरोशिमा – नागासाकी जलाता है
सूली–ज़हर-गाली-गोली
ईसा-मंसूर-सुकरात–लूथर–गाँधी
जलाये जाते किताबों के ढेर
खेली जाती आदमी के लहू से होली
खूनी इबारत बन कर झूठा शब्द
काले अल्फाजों से रौशनी मिटाता  है
मानव मन का अँधेरा बन जाता  है

समय की किताब नकल करते
एक बंजर ज़हन को कबसे
शब्द के बीज की है तलाश
अहसास की बारिश में
कभी उग आये काश !

(रफत आलम)

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2 टिप्पणियाँ to “शब्द … (कविता – रफत आलम)”

  1. रफत जी,
    बहुत ही शानदार कविता
    एक एक शब्द जीवन में प्रति पल सत्य-असत्य के मार्गो से उत्पन्न परिणाम को
    उभारता है।

    साभार धन्यवाद

  2. राकेश जी,बहुत धन्यवाद अपने कविता के मर्म को समझा और सुधि टिप्पणी से नवाजा .

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