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जनवरी 7, 2011

अपनी तलाश …(ग़ज़ल – रफत आलम)

 

जाने कितने गीत गाए हैं खामोशी ने
ये बात और है सुने ही नहीं किसी ने

खारे पानी के स्वाद में छुपा है राज़
समंदर से मिलके क्या कहा नदी ने

खुद अपनी तलाश में कम ही निकला
खुदा को तो बहुत  ढूँढा है आदमी ने

आसमान की जानिब सीढ़ी उठाने वाले
तूने देखे नहीं क्या उतरते हुए जीने

न ले गई मुझे अपने ही पास वरना
कहाँ कहाँ न भटकाया इस दीवानगी ने

दिल के ज़ख्म गिन सका तो बताऊँगा
सांसों के सिवा क्या दिया जिंदगी ने

मुझे सता के दुखी हैं वो क्या सुना
मुझको छेड़ में कहा होगा किसी ने

जुनू के रास्ते चला तो पा गया मंजिल
बंदे को खुदा से मिलाया दीवानगी ने

मैंने जलते हुए घर देखे हैं ए  आलम
तुझको उजाला दिखाया होगा रौशनी ने

(रफत आलम)

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