Archive for जनवरी 6th, 2011

जनवरी 6, 2011

तहज़ीब के हत्यारे और शीला की जवानी…(कविता-रफत आलम)

ही ,..हाय ,..मम- डैड
उछलते कूदते नए सम्बोधन
राम-राम, प्रणाम – सलाम
चुल्लू भर लज्जाजल में डूब मरे

तंग से तंगतर होती पोशाकें
नग्नता से कहीं अधिक
जिस्म की नुमाइश का सामान बनकर
यथार्थ पर हावी होती कल्पना को
‘विज़ुअल रेप’ को खुला निमंत्रण दे रही हैं

मॉर्डन युगी उन्मुक्त्त संवादों का सैलाब
डुबो चुका रुबाई, गज़ल, गीत, छंद
म…बीप..फ ..बीप..,क ..बीप..ई..बीप..बास्टर्ड.
आधुनिकता का पैमाना बन गए
चार अक्षरीय अश्लील शब्द

होंटों के बीच रखा गुलाब का फूल
बसिया गया, सड़िया गया, सठिया गया
‘किस’ की गिनती के आधार पर
फिल्मों की समीक्षा हो रही है आज
टीवी का अफीममय रुपहला नशा
बिग बॉस, राखी का स्वयंवर…….
बीप …बीप..बीप..बीप की विषाक्त जंजीर में
कच्चे ज़हनो को जकडता टी.आर.पी का अर्थजाल

बेमौत मरे संस्कारों के पवित्र कफ़न पर
विदेशी लालमुँही नग्नता के दास
चलता है सो बिकता है के नारे लगाते हुए
शीला की जवानी गा रहे हैं
जैसे रामायण, बुनियाद, तमस, रागदरबारी….
कभी किसी ने देखे ही नही थे

हम सबसे अमीर संस्कृति के मालिक
बैठक वाली डाल के काटने वाले ही नही
अपनी तहज़ीब के हत्यारे भी हैं

(रफत आलम)

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