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जनवरी 2, 2011

खुदा, कैसी ये जमीं कैसा आस्मां …(ग़ज़ल – रफत आलम)

 

समंदर की मेहरबानी पर बहुत यकीं है
शायद तुझे प्यास का अंदाज़ा नहीं है

रोटी के टुकड़े पर पड़े ये आँसू गवाह
शहर में आज कोई भी भूखा नहीं है

काला धन छुपा है साँपों की सुरक्षा में
गरीबी का इलाज यही है और यहीं है

फुटपाथों के सब भिखारी भगा दिए
शहर में अब गरीबी ज़रा भी नहीं है

गन्दगी के ढ़ेरों से मिलता है पता
मुफ़लिसों की बस्ती पास ही कहीं है

हिल गए अपनी कुर्सी के चारों पाए
गिर पड़ने में अब ज्यादा देर नहीं है

मालिक तू किस ज़मीन का खुदा है
नाम तेरा पर ये दबंगों की ज़मीं है

तारे तोड़ लाने वाली बातें रहने दो
अरे साहब अपने घर में तो ज़मीं है

तेरी नमाज़ का खुदा हाफिज ’आलम
दिल तेरा कहीं और सजदे में ज़बीं है

(रफत आलम)

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