Archive for दिसम्बर, 2010

दिसम्बर 7, 2010

वजूद खोजती चार-चार पंक्त्तियाँ…(रफत आलम)

रस्मन बंदगी के मरकज़ हैं
हरम देख के बुतखाना देख
सच्चा सजदा अगर देखना है
दीवाने का सर झुकाना देख|


तुम जाओ मंजिल की तलाश में यारो
हमको मिल जाए तो रास्ता है बहुत
काँटों की चुभन से है जन्मों का साथ
फूलों की मार से डर लगता है बहुत|


प्यास बुझाने की करें कोशिश
कुछ आँखों से खिची पी जाये
फिर भी ना आये अगर करार
ज़हर की पुडिया उठा ली जाये|


 

ये और बात है तहजीवन नवाए रखते हैं सर
अना के सवाल पर मर मिटने वालों में से हैं
कोई इम्तहान बाकी है तो लेले ए दौर हाज़िर
हम झुकने वालों में नहीं टूटने वालों में से हैं|

 

(रफत आलम)

दिसम्बर 5, 2010

भारत तैयार है जननेता के जन्म के लिये

समय कभी-कभी विपरीत का महत्व स्पष्ट तरीके से रेखांकित करता है। कालिख के सामने उजलेपन की महत्ता ज्यादा समझ में आती है। कथा, कहानियों, नाटकों एवम फिल्मों आदि में भी जितना बड़ा खलनायक, उतना ही बड़ा नायक का कद लगने लगता है।

बुराई न हो तो भीड़ के स्तर पर अच्छाई को इतना ज्यादा महत्व शायद न मिले। बुराई की अधिकता ही अच्छाई के अस्तित्व के लिये दिलों में इच्छायें जाग्रत करती है।

पौराणिक नायकों के काल से लेकर वर्तमान समय तक जन मानस पर राज करने वाले नायक वे रहे हैं जिन्होने लोगों को गहरे स्तर तक परेशान करने वाली बुराइयों से लोहा लेकर उन्हे परास्त किया है।

सामाजिक-राजनीतिक परिपेक्ष्य में देखें तो पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों के काल में गाँधी ऐसे जन नेता बने जिन्हे आने वाली सदियाँ माइथॉलोजिकल चरित्र में बदल देंगी। उनके सामने ब्रिटिश हुकुमत जैसी विशालकाय शक्ति खड़ी थी और उन्होने उस वक्त्त की संसार की सबसे बड़ी ताकत का मुकाबला किया। उन्होने देश के अंदर भी भारत के लोगों में व्याप्त कमजोरियों एवम बुराइयों के खिलाफ भी जंग छेड़ी। इतनी बुराइयों के खिलाफ वे न खड़े होते तो अच्छे व्यक्तियों में तो उनका बखान होता पर वे सदियों तक याद रखे जाने वाले महान इंसान की उपाधि न पा पाते और जनता उन्हे भुला बैठती। पर उनके सामने खड़े विलेन ने उन्हे बहुत बड़ा नेता बना दिया। इसमें उनकी निडरता, आत्मशक्त्ति, एवम त्याग करने की इच्छा शक्त्ति का भी भरपूर योगदान है परंतु इस बात का भी महत्व है कि उन्होने बहुत बड़ी शक्त्ति के खिलाफ संघर्ष करने की जिजीविषा दिखाई।

ऐसे समय बहुत कम होते हैं जब संभावना वाले राजनीतिज्ञ नेता बन जाने का सौभाग्य और संभावना पा पाते हैं।

आज के भारत के सामने फिर से ऐसा वक्त्त आ गया है जब नेता उत्पन्न हो सकता है। नेता के उगने के लिये भूमि एकदम तैयार है, उसकी उर्वरा क्षमता बढ़ी हुयी है।

भ्रष्टाचार का मुद्दा भारत को पिछले पैंतीस-चालीस सालों से कुछ ज्यादा ही प्रभावित करता आ रहा है पर जनता में ईमानदारी भी बची हुयी थी तो मिश्रित किस्म का माहौल था पर अब भ्रष्टाचार ने पूरे देश को अपनी जकड़न में ले लिया है और कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार ने भारत में राज कायम कर ही लिया है। आज के दौर में एक आम आदमी के लिये ईमानदार रह पाना लगभग असंभव हो गया है। उसके ईर्द-गिर्द फैली भ्रष्ट शक्तियाँ उसे जीने ही नहीं देंगी यदि वह ईमानदार रहने की जिद करेगा। रोजमर्रा के जीवन से धर्म की हानि ही नहीं बल्कि धर्म का समूचा विनाश हो चुका है।

ऐसे ही समय के लिये गीता में श्री कृष्ण ने वचन कहे हैं।

हर बात का एक वृत होता है और पूरा चक्कर लगाने के बाद जब वापस मूल बिंदु के करीब यात्रा आने लगती है तो यही समय परिवर्तन का होता है। भ्रषटाचार भी अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है और अब ईमानदारी के उजलेपन की गैर-मौजूदगी खलने लगी है।

अब वह समय करीब आता जा रहा है जब ईमानदारी का राज्य फिर से देश में कायम हो सकता है।

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के माहौल को देखते हुये कहा जा सकता है कि भारत एक ऐसा देश बन चुका है जहाँ जीवन के हर क्षेत्र में कीचड़ ही कीचड़ फैली हुयी है। चाहे राजनीतिक क्षेत्र की बात करें, या सामाजिक, आर्थिक या धार्मिक क्षेत्र की, हरेक क्षेत्र सड़ चुका है। भ्रष्टाचार की अधिकता से जीवनदायी तत्व समाप्त हो चुके हैं इसलिये हर क्षेत्र सड़ांध मार रहा है और हरेक दिशा में बदबू फैला रहा है।

पर कीचड़ में भी कमल खिल जाता है।

वृत के पूरा होने पर विपरीत की पुनर्स्थापना होने और करने का वक्त्त भी सामने आने लगता है।

एकल व्यक्ति में तो जागरण की संभावना हरेक दौर में रहती है पर अब वक्त्त आ गया है जब सर्वव्यापी स्तर पर भारत में ईमानदारी और धर्म का राज्य स्थापित हो सकता है।

पर दिखावा नहीं चलेगा, कभी नहीं चला है। नकली लोग अभिनय के क्षेत्र में हाथ आजमा सकते हैं वहाँ अभिनय करने के बदले पैसा मिलता है, वास्तविक जीवन में अभिनय करने से धोखाधड़ी फैलती है जो पिछले कई दशकों से भारत में फैली हुयी है। बहुमत ऐसे लोगों का है जो सही नहीं हैं उस क्षेत्र के लिये जहाँ वे कार्य कर रहे हैं अतः वे अभिनय किये चले जाते हैं।

वर्तमान दौर के राजनीतिज्ञ तो मौका खो रहे हैं अपने कदों को बढ़ाने का। वे भ्रष्टाचार की शक्ति से डरे हुये लोगों की जमात हैं। अगर वे साहस करें तो अपने कदों में इजाफा करके अपने खाते में कुछ पुण्य कमा कर रख सकते हैं।

ईमानदारी की पुनर्स्थापना के लिये भरपूर ईमानदार, चेतन और जाग्रत विवेक वाला व्यक्तित्व ही चाहिये होता है।

भारत की प्रयोगधर्मी भूमि एक बार फिर से जननेता नेता को उत्पन्न करने के लिये तैयार है।

 

…[राकेश]

दिसम्बर 3, 2010

मैं, दरवाजा और वह … (कविता – कृष्ण बिहारी)

कल शाम
मुझे अपने घर का दरवाजा कुछ उदास लगा
मैंने उसके कंधे पर धीरे से हाथ धरा और पूछा –
क्या बात है भाई!
तुम कुछ उदास लगते हो।

उसने मेरी तरफ खाली खाली आँखों से देखा
जैसे देखती हो सूनी गली कोई
नवागंतुक को
और फिर पूछा नि:शब्द
किस दुनिया में रहते हो…
तुम्हे आज पता चला?

सच, यकीन करो… मैंने आज ही ध्यान दिया …
असल में इधर कुछ दिनों से मैं… खैर,
बोलो न क्या बात है?

“कुछ नहीं” उसने कहा –
बस, अब तुम मुझे प्यार नहीं करते
कष्ट देते हो
कभी जोर से बंद करते हो
तो कभी खुला छोड़ देते हो,
तुम्हारी यह लापरवाही बजती है मुझ पर
हथोड़े के घन की तरह,
कहें जाने से पहले मुझे चूमना
और वापस आते ही मेरा हाल पूछना
भूल गये हो तुम,
तुम्हारी सुबह अब उस तरह से शुरु नहीं होती
सोचो, मुझे कैसा लगता होगा…
फिर भी, मुझे फर्क नहीं पड़ता
यह तो मेरी नियति है
तुम जिस दिन घर बदल लोगे
मैं भी …बदल…
मुझे तो बस तुम्हारी हालत पर तरस आता है
कैसे हो गये हो तुम?
जैसे गल रहे हो भीतर ही भीतर
तुम्हे देख मेरी छाती में कुछ दरकता है
मन कसकता है
ऊँचे आसमान से मौत की छलांग लगाने का तमाशा
आखिर कब बंद करोगे तुम?

क्या जवाब दूँ …
मुझे खुद भी मालूम नहीं कि
बहुत पहले किसी यादगार दौर की यरह
कभी खुश तो कभी उदास
क्यों होने लगा हूँ …
मेरा हाल सुनकर चौंकोगे…
जैसे पहले बार माँ बनने वाली स्त्री को पता चले कि
गर्भस्थ शिशु चलने लगा है
और वह अकेले में उसकी चाल महसूसे,
खुश हो
वैसे ही मुझे भी अकेले रहना
अच्छा लगने लगा है,
मैं तुम्हे भूला नहीं हूँ …
लेकिन अब
कोई है जो मेरे भीतर रहने लगा है
सोचो, ऐसे में अगर सुध-बुध भूल गई
तुम्हारा ख्याल नहीं आया तो
क्या तुम मुझे माफ नहीं करोगे?
मेरे मित्र,
मैं तुमसे उसकी ढ़ेर सी बातें करना चाहता था
लेकिन डरता हूँ
तुम्हे दुख होगा…

{कृष्ण बिहारी}

दिसम्बर 1, 2010

बिग बॉस: पारदर्शिता कहाँ है ऐसे रियलिटी कार्यक्रमों में?

लोभ के वशीभूत होकर स्व: लाभ के लिये मनुष्य कैसे व्यवहार करते हैं और कैसे कैसे प्रपंच करते हैं या कर सकते हैं, यह सब स्पष्ट रुप से कलर्स चैनल पर चल रहे रियलिटी शो बिग बॉस में देखा जा सकता है। अगर चैनल और इसके निर्माताओं पर इस बात का नैतिक या विधिक दबाव रहता कि वे कार्यक्रम की गतिविधियों में पारदर्शिता लायें तो बिग बॉस मानव व्यवहार और मनोविज्ञान की कार्यशाला साबित हो सकता था, परंतु बिग बॉस 4 के प्रसारण से अब तक यह साबित हो चुका है कि पारदर्शिता की कमी है।

वोटिंग पर आधारित रियलिटी कार्यक्रमों में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ होती है।

कोई भी ऐसा कार्यक्रम हो जहाँ जनता से एस.एम.एस या फोन आदि के जरिये वोट लिये जाते हैं और जनता की भागीदारी रहती है वहाँ वोटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता अपनायी जानी चाहिये और एक निष्पक्ष कमेटी बननी चाहिये जो इन सब बातों में सच्चाई को बनाये रख सके। जनता की वोटिंग पर आधारित सारे टीवी कार्यक्रमों में निष्पक्षता बनाये रखने के लिये चैनलों पर जनता और सरकार का दबाव बनाया जाना चाहिये, वर्ना चैनल तो अपनी मनमानी करते रहते है।

सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय ने बिग बॉस कार्यक्रम के समय को लेकर कलर्स चैनल के कान थोड़े से उमेठे तो चैनल को सुधार हेतु कदम उठाने पड़े, चैनल को भले ही दिखावे के लिये ही सही पर ऐसा दिखाना पड़ा कि कार्यक्रम के प्रसारण में सुधार किया जा रहा है, कहीं कार्यक्रम का प्रसारण समय रात में ११ बजे न कर दिया जाये इस डर से चैनल ने कुछ मूर्खतापूर्ण घोषणायें भी कीं, जैसे कि एक एपिसोड में बिग बॉस के माध्यम से बताया गया कि पारिवारिक दर्शकों को ध्यान में रखते हुये हिंसा, गाली गलौच और अन्य किस्म के दृष्यों को हटा दिया गया है, बिग बॉस में चौबीसों घंटे कैमरे सब कुछ रिकार्ड करते रहते हैं और सामान्य दर्शकों को उस चौबीस घंटों की रिकार्डिंग में से मुश्किल से एक घंटे की सामग्री दिखायी जाती है तो सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय के आपत्ति दर्शाने से पहले चैनल के पास बुद्धि या इच्छा नहीं थी कि वे ऐसा कुछ न दिखायें जो प्राइम टाइम की आचार संहिता का उल्लंघन करता हो?

अब दूरदर्शन का नैतिक काल नहीं है और सैंकड़ों चैनल काम कर रहे हैं तो सरकार को आचार संहिता बनानी चाहिये। भौगोलिक रुप से भारत भले ही पूर्वी देश कहा जाता हो परंतु सामाजिक मामलों में यहाँ जागरण काफी देर से होता है और तभी होता है जब पानी नाक के स्तर तक ऊपर उठ आता है? अजीब सोता हुआ देश बन गया है भारत।

बिग बॉस जैसे रियलिटी कार्यक्रमों में इस बात की महती आवश्यकता है कि इस तरह के कार्यक्रमों के नियम आदि कार्यक्रम के शुरु होने से पहले ही सबको बताये जाने चाहियें और फिर अंत तक उन नियमों का पालन चैनल को करना चाहिये!

बिग बॉस 4 के अब तक के प्रसारण से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि इस कार्यक्रम का चलाने के लिये कोई नियत नियम लागू नहीं किये जाते हैं और जब जैसा निर्माता और चैनल को पसंद आता है या लाभदायक लगता है वैसा ही किया जाता है। चाहे वह हफ्ते में होने वाले नामांकन की प्रक्रिया हो या नामांकित सदस्यों को बचाने के लिये जनता के मत लेने की प्रक्रिया, इन सब बातों में बिग बॉस की मनमानी चलती है। बहुत बार ऐसा स्पष्ट हो जाता है कि टी.आर.पी के लोभ के कारण बिग बॉस के कर्ता धर्ता निष्पक्ष नहीं रह पाते हैं।

कुछ अनि्यमिततायें स्पष्ट हैं …

– जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब निष्काषित सदस्य द्वारा बाहर जाते हुये नामांकित सदस्य सीधे सीधे अगले हफ्ते के लिये नामांकित हो जाते हैं और जब चैनल को लगता है कि इन सदस्यों के नामांकित होने से जनता ज्यादा फोन या एस.एम.एस नहीं करेगी तो उस हफ्ते यह प्रक्रिया बदल दी जाती है और बाहर जाने वाले सदस्य के वोट को एक वोट मान लिया जाता है।

–  जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब नामांकन की प्रक्रिया खुले में लीविंग एरिया में होती है और जब बिग बॉस न चाहें तब बंद कमरे में। जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब उस हफ्ते का कप्तान सबके सामने एक सदस्य का नाम लेता है और जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब कप्तान को भी बंद कमरे में जाकर ऐसा करना पड़ता है।

– जनता के फोन और एस.एम.एस से मिलने वाले आर्थिक लाभ का भूत इस कदर सवार रहता है कि हर हफ्ते नियम बदल दिये जाते हैं। जनता में लोकप्रिय सदस्यों का नामांकन होना चैनल के आर्थिक हित में है अतः ऐसे दाव-पेंच आजमाये जाते हैं जिससे कि अगर हर हफ्ते नहीं तो हर दूसरे हफ्ते ऐसे सदस्यों में से एक दो नामांकित होते रहें।

– कोई नहीं जानता कि किस सदस्य को कितने मत मिले? यह एक रियलिटी कार्यक्रम है और आम जनता की भागीदारी से चलता है तो जनता को पूरा अधिकार होना चाहिये उसके द्वारा दिये गये मतों के बारे में।

– बिग बॉस में ऐसा हो चुका है कि सोमवार को सदस्यों को नामांकित करने के बाद जनता से नामांकित सदस्यों के पक्ष में वोट देने की अपील की गयी है, और 2-3 दिन बाद बुधवार या बृहस्पतिवार को बिग बॉस बताते हैं कि घर में रह रहे सदस्योम को नहीं पता कि वोटिंग लाइंस बंद हैं। इसका अर्थ यह है कि चैनल और टेलिकॉम कम्पनी ने 2-3 दिन तो जनता के पैसे खर्च करवाये फोन और एस.एम.एस करने में और बाद में अपनी मनमानी चलाते हुये उन मतों का कोई उपयोग न करते हुये उस हफ्ते के लिये नियम ही बदल दिये। ऐसी अनियमिततायें कार्यक्रम में पारदर्शैता का अभाव दर्शाती हैं और इसके निष्पक्ष होने के बारे में संदेह उत्पन्न करती हैं। इसके अलावा यह जनता के साथ एक तरह की धोखाधड़ी भी है।

– नियम के तहत ऐसा कहा जाता है कि बिग बॉस में नामांकन घर में रह रहे सदस्यों के हाथ में और नामांकित सदस्यों का निष्काषन जनता के हाथों में है पर व्यवहार में ऐसा होता दिखायी नहीं देता और बिग बॉस के कर्ता धर्ता थोड़ी बहुत अनियमिततायें कर देते हैं और इन फैसलों को अपनी मनमर्जी के मुताबिक प्रभावित करते हैं।

इस कार्यक्रम को लोग देखते हैं तो इसका स्थान तो भारतीय टीवी के क्षेत्र में बन ही चुका है और अगर चैनल और कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता इसे पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से चलायें तो उन्हे टी.आर.पी के लिये खुद ही जोड़ तोड़ करने की जरुरत नहीं पड़ेगी बल्कि पारदर्शिता और निष्पक्षता ऐसे कार्यक्रमों की विश्वसनीयता को बढ़ायेगी।

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