अनस्तित्व … (कविता – कृष्ण बिहारी)

 

खेत की मेंड़ से
सटे हुये अपने आम के पेड़ के नीचे
बैठकर सुस्ताते हुये
रामअधार ने अपनी बीवी से कहा –
तुम्हारे आँचल की हवा से
सुखाते अपने पसीने को देखता हुआ मैं
अपने और तुम्हारे
श्रम के निहितार्थ सोच रहा हूँ।

भूल गया हूँ इस समय
खेती-बारी और दुनिया के झमेले
और चिंताएं कि
यदि आ गई बाढ़
या पढ़ गया सूखा तो
जीयेंगे किस तरह हम और हमारे बच्चे।

फिलहाल तो तुम हो
और तुम्हारे आँचल की हवा है
मैं हूँ
और सूखता पसीना है
इन पलों के शीतल सुख के आगे
आगत की चिंता
वर्तमान को खोना है
साली बाढ़…जब आयेगी…तब आयेगी
सूखा… जब पड़ेगा… तब पड़ेगा…
अभी तो तुम्हे और मुझे
हम होना है।

{कृष्ण बिहारी}

3 Responses to “अनस्तित्व … (कविता – कृष्ण बिहारी)”

  1. आगत की चिंता
    वर्तमान को खोना है|

    बड़ी गहरी बात है, जीवन तो आज अभी यहीं है, बाकी सब कल्पनाओं और स्मृतियों के विस्तृत रुप हैं

  2. prem har dukh ddaridraya aur museebat ko halkaa aur shoony banaa deta hai ..damptya ka prem to adbhut roop se iss kavita men mukhrit hua hai . kavi ko badhaayiyan .

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