ना होने तक…(कविता – रफत आलम)

वक्त की डोर में
गुच्छा है जिंदगी
एक सिरा मिले अगर
दूसरे का पता नहीं

कश्मकश दर कश्मकश
टूटन ही टूटन
जोड़ने की कोशिश में
लगती अनगिनत गांठें

हासिल क्या
छोटा – बडा होता
बस उलझन का दायरा
वक्त भी आखिर
जाने झुंझलाकर
फ़ेंक देता है जाने कहाँ
जिंदगी का अनसुलझा गुच्छा!

(रफत आलम)

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One Comment to “ना होने तक…(कविता – रफत आलम)”

  1. गुछ्छे तुम्हारी याद के, सेया करून्गा रोज /
    चुग्गा चुगा करून्गा, तेरे इन्तजार में //
    ये क्या गजब किया और क्या अजब कहा ?
    कोई समझ न पाया, तेरे राजेदार में //

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