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दिसम्बर 14, 2010

मसीहा कोई नहीं …(गज़ल – रफत आलम)

कहने को बहुत कुछ है सुनने वाला कोई नही
खामोश रहने के सिवा और रास्ता कोई नहीं।

ये नहीं के कोई गिला ही नहीं है मेरे दिल में
चुप हूँ के शिकायतों से अब हिलता कोई नहीं

कैसे कैसे लोग हैं जिनसे प्यारे प्यारे रिश्ते हैं
दिल की राह पर आकर पर मिलता कोई नहीं

अब कहाँ जाऊँ रौशनी का पता पूछने के लिए
बुझे चुके  चरागों का शायद मसीहा कोई नहीं

स्वांग की इस बस्ती का बडा बहरूपिया हूँ मैं
मुखौटे ही मुखौटे हैं हम यहाँ चेहरा कोई नहीं

मुस्कानों का बंटवारा करके तू भी खुश मैं भी
कितने लगे हैं ज़ख्म सीने में खोलता कोई नहीं

मुस्कानों में बतियाने वाले हैं सब यहाँ ’आलम
सूनी आँखों की भाषा अब समझता कोई नहीं

(रफत आलम)

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