Archive for दिसम्बर 11th, 2010

दिसम्बर 11, 2010

जिंदगी का मेला … गज़ल (रफत आलम)

 

शहर में भीड़ का रेला चल रहा है,
पर हर आदमी अकेला चल रहा है|

किस रिश्ते को अपना कहा जाये,
भाइयों में भी झमेला चल रहा है|

देखिए लम्हे हलाहल बनते हैं कब,
वक्त मेरा भी कसेला चल रहा है|

दौर ऐ तरक्की क्या यही है यारो,
आदमी बना हाथठेला चल रहा है|

मौत के सकूत की तरफ ऐ “ आलम
ये जिंदगानी का मेला चल रहा है।

(रफत आलम)

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