वजूद खोजती चार-चार पंक्त्तियाँ…(रफत आलम)

रस्मन बंदगी के मरकज़ हैं
हरम देख के बुतखाना देख
सच्चा सजदा अगर देखना है
दीवाने का सर झुकाना देख|


तुम जाओ मंजिल की तलाश में यारो
हमको मिल जाए तो रास्ता है बहुत
काँटों की चुभन से है जन्मों का साथ
फूलों की मार से डर लगता है बहुत|


प्यास बुझाने की करें कोशिश
कुछ आँखों से खिची पी जाये
फिर भी ना आये अगर करार
ज़हर की पुडिया उठा ली जाये|


 

ये और बात है तहजीवन नवाए रखते हैं सर
अना के सवाल पर मर मिटने वालों में से हैं
कोई इम्तहान बाकी है तो लेले ए दौर हाज़िर
हम झुकने वालों में नहीं टूटने वालों में से हैं|

 

(रफत आलम)

2 टिप्पणियाँ to “वजूद खोजती चार-चार पंक्त्तियाँ…(रफत आलम)”

  1. प्यास बुझाने की करें कोशिश
    कुछ आँखों से खिची पी जाये
    फिर भी ना आये अगर करार
    ज़हर की पुडिया उठा ली जाये|

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ …

  2. बहुत शुक्रिया मोहतरमा संगीता साहिबा

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