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दिसम्बर 5, 2010

भारत तैयार है जननेता के जन्म के लिये

समय कभी-कभी विपरीत का महत्व स्पष्ट तरीके से रेखांकित करता है। कालिख के सामने उजलेपन की महत्ता ज्यादा समझ में आती है। कथा, कहानियों, नाटकों एवम फिल्मों आदि में भी जितना बड़ा खलनायक, उतना ही बड़ा नायक का कद लगने लगता है।

बुराई न हो तो भीड़ के स्तर पर अच्छाई को इतना ज्यादा महत्व शायद न मिले। बुराई की अधिकता ही अच्छाई के अस्तित्व के लिये दिलों में इच्छायें जाग्रत करती है।

पौराणिक नायकों के काल से लेकर वर्तमान समय तक जन मानस पर राज करने वाले नायक वे रहे हैं जिन्होने लोगों को गहरे स्तर तक परेशान करने वाली बुराइयों से लोहा लेकर उन्हे परास्त किया है।

सामाजिक-राजनीतिक परिपेक्ष्य में देखें तो पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों के काल में गाँधी ऐसे जन नेता बने जिन्हे आने वाली सदियाँ माइथॉलोजिकल चरित्र में बदल देंगी। उनके सामने ब्रिटिश हुकुमत जैसी विशालकाय शक्ति खड़ी थी और उन्होने उस वक्त्त की संसार की सबसे बड़ी ताकत का मुकाबला किया। उन्होने देश के अंदर भी भारत के लोगों में व्याप्त कमजोरियों एवम बुराइयों के खिलाफ भी जंग छेड़ी। इतनी बुराइयों के खिलाफ वे न खड़े होते तो अच्छे व्यक्तियों में तो उनका बखान होता पर वे सदियों तक याद रखे जाने वाले महान इंसान की उपाधि न पा पाते और जनता उन्हे भुला बैठती। पर उनके सामने खड़े विलेन ने उन्हे बहुत बड़ा नेता बना दिया। इसमें उनकी निडरता, आत्मशक्त्ति, एवम त्याग करने की इच्छा शक्त्ति का भी भरपूर योगदान है परंतु इस बात का भी महत्व है कि उन्होने बहुत बड़ी शक्त्ति के खिलाफ संघर्ष करने की जिजीविषा दिखाई।

ऐसे समय बहुत कम होते हैं जब संभावना वाले राजनीतिज्ञ नेता बन जाने का सौभाग्य और संभावना पा पाते हैं।

आज के भारत के सामने फिर से ऐसा वक्त्त आ गया है जब नेता उत्पन्न हो सकता है। नेता के उगने के लिये भूमि एकदम तैयार है, उसकी उर्वरा क्षमता बढ़ी हुयी है।

भ्रष्टाचार का मुद्दा भारत को पिछले पैंतीस-चालीस सालों से कुछ ज्यादा ही प्रभावित करता आ रहा है पर जनता में ईमानदारी भी बची हुयी थी तो मिश्रित किस्म का माहौल था पर अब भ्रष्टाचार ने पूरे देश को अपनी जकड़न में ले लिया है और कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार ने भारत में राज कायम कर ही लिया है। आज के दौर में एक आम आदमी के लिये ईमानदार रह पाना लगभग असंभव हो गया है। उसके ईर्द-गिर्द फैली भ्रष्ट शक्तियाँ उसे जीने ही नहीं देंगी यदि वह ईमानदार रहने की जिद करेगा। रोजमर्रा के जीवन से धर्म की हानि ही नहीं बल्कि धर्म का समूचा विनाश हो चुका है।

ऐसे ही समय के लिये गीता में श्री कृष्ण ने वचन कहे हैं।

हर बात का एक वृत होता है और पूरा चक्कर लगाने के बाद जब वापस मूल बिंदु के करीब यात्रा आने लगती है तो यही समय परिवर्तन का होता है। भ्रषटाचार भी अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है और अब ईमानदारी के उजलेपन की गैर-मौजूदगी खलने लगी है।

अब वह समय करीब आता जा रहा है जब ईमानदारी का राज्य फिर से देश में कायम हो सकता है।

देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के माहौल को देखते हुये कहा जा सकता है कि भारत एक ऐसा देश बन चुका है जहाँ जीवन के हर क्षेत्र में कीचड़ ही कीचड़ फैली हुयी है। चाहे राजनीतिक क्षेत्र की बात करें, या सामाजिक, आर्थिक या धार्मिक क्षेत्र की, हरेक क्षेत्र सड़ चुका है। भ्रष्टाचार की अधिकता से जीवनदायी तत्व समाप्त हो चुके हैं इसलिये हर क्षेत्र सड़ांध मार रहा है और हरेक दिशा में बदबू फैला रहा है।

पर कीचड़ में भी कमल खिल जाता है।

वृत के पूरा होने पर विपरीत की पुनर्स्थापना होने और करने का वक्त्त भी सामने आने लगता है।

एकल व्यक्ति में तो जागरण की संभावना हरेक दौर में रहती है पर अब वक्त्त आ गया है जब सर्वव्यापी स्तर पर भारत में ईमानदारी और धर्म का राज्य स्थापित हो सकता है।

पर दिखावा नहीं चलेगा, कभी नहीं चला है। नकली लोग अभिनय के क्षेत्र में हाथ आजमा सकते हैं वहाँ अभिनय करने के बदले पैसा मिलता है, वास्तविक जीवन में अभिनय करने से धोखाधड़ी फैलती है जो पिछले कई दशकों से भारत में फैली हुयी है। बहुमत ऐसे लोगों का है जो सही नहीं हैं उस क्षेत्र के लिये जहाँ वे कार्य कर रहे हैं अतः वे अभिनय किये चले जाते हैं।

वर्तमान दौर के राजनीतिज्ञ तो मौका खो रहे हैं अपने कदों को बढ़ाने का। वे भ्रष्टाचार की शक्ति से डरे हुये लोगों की जमात हैं। अगर वे साहस करें तो अपने कदों में इजाफा करके अपने खाते में कुछ पुण्य कमा कर रख सकते हैं।

ईमानदारी की पुनर्स्थापना के लिये भरपूर ईमानदार, चेतन और जाग्रत विवेक वाला व्यक्तित्व ही चाहिये होता है।

भारत की प्रयोगधर्मी भूमि एक बार फिर से जननेता नेता को उत्पन्न करने के लिये तैयार है।

 

…[राकेश]

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