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दिसम्बर 1, 2010

बिग बॉस: पारदर्शिता कहाँ है ऐसे रियलिटी कार्यक्रमों में?

लोभ के वशीभूत होकर स्व: लाभ के लिये मनुष्य कैसे व्यवहार करते हैं और कैसे कैसे प्रपंच करते हैं या कर सकते हैं, यह सब स्पष्ट रुप से कलर्स चैनल पर चल रहे रियलिटी शो बिग बॉस में देखा जा सकता है। अगर चैनल और इसके निर्माताओं पर इस बात का नैतिक या विधिक दबाव रहता कि वे कार्यक्रम की गतिविधियों में पारदर्शिता लायें तो बिग बॉस मानव व्यवहार और मनोविज्ञान की कार्यशाला साबित हो सकता था, परंतु बिग बॉस 4 के प्रसारण से अब तक यह साबित हो चुका है कि पारदर्शिता की कमी है।

वोटिंग पर आधारित रियलिटी कार्यक्रमों में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ होती है।

कोई भी ऐसा कार्यक्रम हो जहाँ जनता से एस.एम.एस या फोन आदि के जरिये वोट लिये जाते हैं और जनता की भागीदारी रहती है वहाँ वोटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता अपनायी जानी चाहिये और एक निष्पक्ष कमेटी बननी चाहिये जो इन सब बातों में सच्चाई को बनाये रख सके। जनता की वोटिंग पर आधारित सारे टीवी कार्यक्रमों में निष्पक्षता बनाये रखने के लिये चैनलों पर जनता और सरकार का दबाव बनाया जाना चाहिये, वर्ना चैनल तो अपनी मनमानी करते रहते है।

सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय ने बिग बॉस कार्यक्रम के समय को लेकर कलर्स चैनल के कान थोड़े से उमेठे तो चैनल को सुधार हेतु कदम उठाने पड़े, चैनल को भले ही दिखावे के लिये ही सही पर ऐसा दिखाना पड़ा कि कार्यक्रम के प्रसारण में सुधार किया जा रहा है, कहीं कार्यक्रम का प्रसारण समय रात में ११ बजे न कर दिया जाये इस डर से चैनल ने कुछ मूर्खतापूर्ण घोषणायें भी कीं, जैसे कि एक एपिसोड में बिग बॉस के माध्यम से बताया गया कि पारिवारिक दर्शकों को ध्यान में रखते हुये हिंसा, गाली गलौच और अन्य किस्म के दृष्यों को हटा दिया गया है, बिग बॉस में चौबीसों घंटे कैमरे सब कुछ रिकार्ड करते रहते हैं और सामान्य दर्शकों को उस चौबीस घंटों की रिकार्डिंग में से मुश्किल से एक घंटे की सामग्री दिखायी जाती है तो सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय के आपत्ति दर्शाने से पहले चैनल के पास बुद्धि या इच्छा नहीं थी कि वे ऐसा कुछ न दिखायें जो प्राइम टाइम की आचार संहिता का उल्लंघन करता हो?

अब दूरदर्शन का नैतिक काल नहीं है और सैंकड़ों चैनल काम कर रहे हैं तो सरकार को आचार संहिता बनानी चाहिये। भौगोलिक रुप से भारत भले ही पूर्वी देश कहा जाता हो परंतु सामाजिक मामलों में यहाँ जागरण काफी देर से होता है और तभी होता है जब पानी नाक के स्तर तक ऊपर उठ आता है? अजीब सोता हुआ देश बन गया है भारत।

बिग बॉस जैसे रियलिटी कार्यक्रमों में इस बात की महती आवश्यकता है कि इस तरह के कार्यक्रमों के नियम आदि कार्यक्रम के शुरु होने से पहले ही सबको बताये जाने चाहियें और फिर अंत तक उन नियमों का पालन चैनल को करना चाहिये!

बिग बॉस 4 के अब तक के प्रसारण से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि इस कार्यक्रम का चलाने के लिये कोई नियत नियम लागू नहीं किये जाते हैं और जब जैसा निर्माता और चैनल को पसंद आता है या लाभदायक लगता है वैसा ही किया जाता है। चाहे वह हफ्ते में होने वाले नामांकन की प्रक्रिया हो या नामांकित सदस्यों को बचाने के लिये जनता के मत लेने की प्रक्रिया, इन सब बातों में बिग बॉस की मनमानी चलती है। बहुत बार ऐसा स्पष्ट हो जाता है कि टी.आर.पी के लोभ के कारण बिग बॉस के कर्ता धर्ता निष्पक्ष नहीं रह पाते हैं।

कुछ अनि्यमिततायें स्पष्ट हैं …

– जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब निष्काषित सदस्य द्वारा बाहर जाते हुये नामांकित सदस्य सीधे सीधे अगले हफ्ते के लिये नामांकित हो जाते हैं और जब चैनल को लगता है कि इन सदस्यों के नामांकित होने से जनता ज्यादा फोन या एस.एम.एस नहीं करेगी तो उस हफ्ते यह प्रक्रिया बदल दी जाती है और बाहर जाने वाले सदस्य के वोट को एक वोट मान लिया जाता है।

–  जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब नामांकन की प्रक्रिया खुले में लीविंग एरिया में होती है और जब बिग बॉस न चाहें तब बंद कमरे में। जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब उस हफ्ते का कप्तान सबके सामने एक सदस्य का नाम लेता है और जब बिग बॉस की इच्छा होती है तब कप्तान को भी बंद कमरे में जाकर ऐसा करना पड़ता है।

– जनता के फोन और एस.एम.एस से मिलने वाले आर्थिक लाभ का भूत इस कदर सवार रहता है कि हर हफ्ते नियम बदल दिये जाते हैं। जनता में लोकप्रिय सदस्यों का नामांकन होना चैनल के आर्थिक हित में है अतः ऐसे दाव-पेंच आजमाये जाते हैं जिससे कि अगर हर हफ्ते नहीं तो हर दूसरे हफ्ते ऐसे सदस्यों में से एक दो नामांकित होते रहें।

– कोई नहीं जानता कि किस सदस्य को कितने मत मिले? यह एक रियलिटी कार्यक्रम है और आम जनता की भागीदारी से चलता है तो जनता को पूरा अधिकार होना चाहिये उसके द्वारा दिये गये मतों के बारे में।

– बिग बॉस में ऐसा हो चुका है कि सोमवार को सदस्यों को नामांकित करने के बाद जनता से नामांकित सदस्यों के पक्ष में वोट देने की अपील की गयी है, और 2-3 दिन बाद बुधवार या बृहस्पतिवार को बिग बॉस बताते हैं कि घर में रह रहे सदस्योम को नहीं पता कि वोटिंग लाइंस बंद हैं। इसका अर्थ यह है कि चैनल और टेलिकॉम कम्पनी ने 2-3 दिन तो जनता के पैसे खर्च करवाये फोन और एस.एम.एस करने में और बाद में अपनी मनमानी चलाते हुये उन मतों का कोई उपयोग न करते हुये उस हफ्ते के लिये नियम ही बदल दिये। ऐसी अनियमिततायें कार्यक्रम में पारदर्शैता का अभाव दर्शाती हैं और इसके निष्पक्ष होने के बारे में संदेह उत्पन्न करती हैं। इसके अलावा यह जनता के साथ एक तरह की धोखाधड़ी भी है।

– नियम के तहत ऐसा कहा जाता है कि बिग बॉस में नामांकन घर में रह रहे सदस्यों के हाथ में और नामांकित सदस्यों का निष्काषन जनता के हाथों में है पर व्यवहार में ऐसा होता दिखायी नहीं देता और बिग बॉस के कर्ता धर्ता थोड़ी बहुत अनियमिततायें कर देते हैं और इन फैसलों को अपनी मनमर्जी के मुताबिक प्रभावित करते हैं।

इस कार्यक्रम को लोग देखते हैं तो इसका स्थान तो भारतीय टीवी के क्षेत्र में बन ही चुका है और अगर चैनल और कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता इसे पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से चलायें तो उन्हे टी.आर.पी के लिये खुद ही जोड़ तोड़ करने की जरुरत नहीं पड़ेगी बल्कि पारदर्शिता और निष्पक्षता ऐसे कार्यक्रमों की विश्वसनीयता को बढ़ायेगी।

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