झूठन…(कविता-रफत आलम)

पंचतारा होटल से नज़दीक
देर रात पार्टी के बाद
फेंकी गयी झूठन की बाँट में
शूकर – कुत्तों के साथ
आदमी भी है शामिल
खोजते छांटते बीनते
कुछ खाने योग्य।

शहर को दिखता नहीं ये मंज़र
या जानबूझ कर अंधे बने हैं
हम संवेदना से हीन भूरे साब
घिन से मुँह फेर लेते हैं।

अपने सम्मानीय मेहमान
गोरे पर्यटक ही अच्छे
आँखों के साथ
कैमरे से भी देखते हैं।

(रफत आलम)

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2 टिप्पणियाँ to “झूठन…(कविता-रफत आलम)”

  1. हम संवेदना से हीन भूरे साब
    घिन से मुँह फेर लेते हैं।
    सही बात है गोरे कम से कम सफाई का तो ध्यान रखते ही हैं। शुभकामनायें।

  2. nirmla.kapila ji ,bahut shukria.ye roz ki ghatnaye hai jinse ho sake to sabak liya jaye aur jo shoshit , gire hue hai hain unke liye kuch kiya jaye .

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