Archive for अक्टूबर, 2010

अक्टूबर 7, 2010

कुछ काव्य कुछ विचार … (रफत आलम)

गाँव उजड़ा, क़स्बा बसा
दिल उजड़ा, कभी ना बसा|


वो हथेली पढ़े कौन
जिसकी मुट्ठी खाली है|

 

तेरी बाहों की याद से बेचैन हो जाता हूँ
किसी किताब से लिपट कर सो जाता हूँ|

 

मुमकिन है वक्त हर ज़ख़्म भर देता हो
ज़ख्म भर भी जायें तो निशान कहाँ जाते हैं|

 

सदा ए दीवानगी में बहुत कुछ है अगर कोई समझे
वरना तो हंस के गुजर जाना दुनिया का काम है|

 

(रफत आलम)

अक्टूबर 6, 2010

वक्त का चलन … (गज़ल – रफत आलम)

वक्त का चलन खराब है ना सर उठा
बचा खुद को देख के वो पत्थर उठा

गुमराही लिखी गयी हम लोगों के वास्ते
ना कोई अवतार आया ना पैगम्बर उठा

ऐसा ना हो पगड़ी पावों  में  आ गिरे
बुलंदियों के चाव में इतना ना सर उठा

बालू के कण ने पढाया बुलंदी का पाठ
बूँद की गोद से निकल कर समंदर उठा

रोती हुई तस्वीरों का खरीदार बने कौन
दिखाना है तो कोई सुहाना मंज़र उठा

आओ सो जाओ दूर से आया था बुलावा
मुसाफिर चल दिया बोरिया बिस्तर उठा

हो रहा था फैसला ए जुर्म ए मोहब्बत
दीवाने खड़े थे मौत को सर पर उठा

पंचायत के सामने लैला मजनू बंधे थे
और गांव दोड़ा जा रहा था पत्थर उठा

सच केवल नील कंठ ही है के जिसने
अमृत का प्याला छोड दिया ज़हर उठा

सुकरात की याद में अक्सर ए  ‘आलम
प्याले तो उठे ना जाम ए ज़हर उठा

(रफत आलम)

अक्टूबर 3, 2010

बहुरुपिये…(कविता- रफत आलम)

मुखौटे लगा कर
छलने वाले बहरूपियो
हमें ठग कर क्या लोगे ?

खून पसीना
फुटपाथ
टपकती खोली|

नहीं, नहीं
तुम तो
लाचारी
गरीबी
भुखमरी
बेघरी और बेबसी के सौदे कर
मसीहा वाला मुखौटा ओढ़े
महलों की मीनार पर
जा ही बैठे हो |

वक्त
एक भूखा बनकर
पार्टी की झूठन
चुनते हुए सोच रहा है
बहरूपिये
मुखौटा लगाते लगाते
अपना चहरा भूल गये|

वही एक
दूध को तरसते
बच्चे वाला
ज़र्द चेहरा।

(रफत आलम)

अक्टूबर 3, 2010

ध्वनियाँ …. (कविता- कृष्ण बिहारी)

एक नाद है
जो गूँजता है
मुझमें डमरु की तरह शिव के।

मुझे मिलती हैं ध्वनियाँ
करती रहती हैं मेरा निर्माण अहर्निश।

मुझमें गूँजती हैं मेरे गाँव की नदी
और मेरे शहर की हर छटपटाहट।

मेरा शहर मजदूरों का शहर है
गाँव और शहर
दोनों जानते हैं अच्छी तरह हर कदम यह
कि जिस दिन वे मेरी स्मृति बनेंगे
बढ़ जायेगा मेरा अधूरापन और।

मेरी आवाज उनके कानों में उतरती है
मंदिर की घंटियों- सी
वे पुकारते हैं मुझे शंख ध्वनि बनकर
इस अपनेपन के आगे बौनी लगती है हर उपलब्धि
जैसे कोई जहाज शोर मचाता
हवाओं में गुम हो जाये
गायब हो जायेंगी उपलब्धियाँ छायाओं- सी
सिनेमा का परदा हो जायेगा
मध्यांतर- सा कोरा।

मुझे रहना है ध्वनियों के साथ
सुनना है शिव के डमरु की तड़क
महसूसना है समय की शक्ति को
छोड़ने हैं शब्द
करनी है रचना ईश्वर की तरह
निभाना है कवि-धर्म।
अपनी यात्राओं में
पार करने हैं अनगिनत दुर्गम रास्ते
होना है एक दिन मुझे शेरपा तेनजिंग
अपने हिमालय के लिये
और फिर देनी है आवाज ब्रह्मांड को।

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 2, 2010

गाँधी : क्या खूब कारीगरी है महात्मा

ओ रे महात्मा !
एक सदी बीत गयी तुझे गाली खाते खाते
कितने सारे लोग
गाली देते हैं तुझे
जब वे बहस करते हैं
अपने कमरों में
पान की दुकानों पर
गलियों में कूचों में
होटलों में
विश्वविधालयों में
यहाँ वहाँ
इधर उधर
इस जगह उस जगह
हर जगह तुझे
गालियों से विभूषित किया जाता है।

अपनी कमजोरियों को नज़रअंदाज़ करते हुये
तेरे आलोचक कोसते हैं तुझे –
अरे बूढ़े!
तू ही तो था
जिसके कारण
भारत का बँटवारा हुआ
हम फसल काट रहे हैं
उन समस्यायों की
जिनके बीज तूने बोये थे।

लोगों को विश्वास नहीं है
अपनी साधारण समझ पर ही
परन्तु वे चुनौती देते हैं
तेरी सामाजिक और राजनीतिक समझ को
वे कहते हैं –
तू था ही ऐसा लुजं-पुंज आदमी
तभी तो झट से असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया
अरे बाइस पुलिसिये ही तो जलाये थे
भीड़ ने,
अंग्रेजों ने क्या कम
जुल्म ढ़ाये थे
आम जनता पर?
पर नहीं तुझे भारत के लोगों के
दुख दर्द से क्या मतलब था,
तुझे तो अहिंसा के वायरस ने
बीमार किया हुआ था।

लोग कुछ नहीं करते दूसरों के लिये
पर वे तुझ पर आरोप लगाते हैं –
तू पूरी ज़िंदगी
सिर्फ और सिर्फ अपने लिये जिया
तू जिया बड़ा नाम कमाने के लिये।

लोग जो बारह से पचास तक
की आयु वाली किसी भी नारी का
अपनी वासना भरी दृष्टि से
चीर-हरण करने में हर समय
व्यस्त रहते हैं
वे ही तेरे ब्रहमचर्य के
प्रयोगों का
मज़ाक उड़ाते हैं
वे खिल्ली उड़ाते हैं तेरी-
क्यों तुझे बुढ़ापे में
कम उम्र की युवतियों के
कँधों का सहारा लेने की
आदत लगी?

हिन्दू चिल्लाते हैं –
तेरे ही कारण ये मुसलमान
इतना इतराते रहे हैं
मुसलमान जो
मोहम्मद गोरी, महमूद गजनवी, खिलजी
तैमूर, बाबर, औरंगज़ेब जैसे
दुर्दांत और क्रूर आक्रमणकारियों के
वंशज हैं
उन्हे तूने हिन्दुओं के
बराबर का मान लिया!
तू भूल गया
कैसे सदियों से हिन्दुओं को
सताया गया है
उनके सब घृणित कामों को
भूल कर तूने उन्हे
प्रेम दिया
ऐसी आततायी कौम के लोगों के
हितों के लिये
तूने आमरण अनशन किये!
जिन मुसलमानों ने भारत की
पीठ में छुरा घोंप दिया
और पाकिस्तान बना दिया
उन्ही के लिये
पचपन करोड़ की राशी देने के लिये
तू फिर से
खाना-पीना छोड़कर
खटिया पर लेट गया
धिक्कार है
तुझ पर ओ बूढ़े,
कितने घृणित कार्य थे तेरे
कितनी घटिया सोच थी तेरी
तू अवश्य ही नर्क में गया होगा
तू हड्डियों का ढ़ाँचा मात्र था
एक कमजोर आदमी
तभी तू अहिंसा के झूठे
परदे के पीछे छिपा रहा उम्र भर
गोडसे ने कितना अच्छा काम किया
तुझे मार कर
अन्यथा तू तो आजादी के बाद
देश का बेड़ा ही गर्क कर देता।
उसने एक पवित्र काम किया!

बहुत सारे हिन्दू हल्ला मचाते हैं –

नीची जातियों के जो लोग ऊँची जातियों के लोगों की
सेवा करने के लिये जन्म लेते हैं
उन्हे तूने हरिजन -ईश्वर की संतान कह दिया!
अब मज़ा देख
वही लोग अब तूझे
कोसते हैं शैतान कहकर
तू ऐसे ही व्यवहार के काबिल था।

मुसलमान भी तुझे नफरत
भरी दृष्टि से ही देखते हैं
छाती ठोककर
वे तुझे कोसते हैं और दावे करते हैं-
तू हिन्दु जन्मा था
और तूने केवल हिन्दुओं के ही हितों
का ख्याल किया उम्र भर
और तूने मुसलमानों के लिये कुछ नहीं किया।

लोग कुछ भी नहीं पढ़ते तेरे बारे में
वे इतिहास, राजनीति, मानव विज्ञान, समाज विज्ञान
कुछ भी नहीं समझते
पर वे क्षण भर भी नहीं लगाते
तेरे द्वारा किये गये कामों को नकारने में।

वे कोसते हैं
तुझे और तेरे अहिंसा के सिद्धांतों को-
अंग्रेजों ने
भारत और भारतीयों का
जमकर शोषण किया
तब भी तूने जोर दिया कि
उनके साथ अच्छा सलूक किया जाये
कितनी तुच्छ मानसिकता थी तेरी

…………….

पर बापू
एक मजे की बात यह है कि
यह सब कहते हुये
लोगों की
जुबान लड़खड़ाती है
नफरत की ज्वाला में
जलते हुये
वे कह तो जाते हैं
पर खुद उन्हे भी पता होता है कि
वे सफेद झूठ बोल रहे हैं

और सबसे बड़े आनंद की बात तो यह है
महात्मा कि
पिछले साठ सालों में
हर दल की विचारधारा और राजनीति ने
भरकस कोशिश की है कि
जनमानस तुझे भूल जाये
तेरा अस्तित्व हर राजनीतिज्ञ को
कालिख से पुता हुआ जो दिखाने लगता है
नेताओं ने भरपूर प्रयास किये हैं तुझे
अंधेरे बंद कमरों में कैद रखने के
पर पता नहीं कैसे
तुम किसी न किसी कोने से
फिर उजाला फैलाते
सामने आ ही जाते हो।

ये तुम्हारी जादूगरी है
बड़े कमाल की!

बापू, उनके जीवन और उनकी विचारधारा में रुचि रखने वाले लोग बापू को समर्पित एक वेबसाइट देख सकते हैं

…[राकेश]

अक्टूबर 1, 2010

कभी तुम भी समझोगे हमें…(रफत आलम)

ज़हर के प्याले से ना डरे
सूली के भी गले लगे
जंजीरों की आवाज़ में भी हमने
खनकती चूड़ियों के गीत सुने
तुम ना समझ सके हमें तो क्या
सदियों ने हमारे पैगाम
सर आँखों पर रखे
हम काँटों भारी राह पर चले
इसलिए के तुम्हे रास्ता साफ़ मिलें
तुम कहो जिंदगी नाकाम हुई
नाकाम ही सही
अनाम रह गाये
तो ये नाम ही सही
तुम्हारा आगाज़ हमारा अंजाम ही सही
अश्क, छाले और कांटे इनाम ही सही
हम सच के उपासक सच बोलते रहेंगें
कलम के तराजू में खरा तोलते रहेंगे
गिरह अकेले आदम की खोलते रहेंगे
तख़्त-ओ-ताज हमसे होलते रहेंगे
काट कर ही जुल्मो सितम को दम लेते हैं
जान अपनी हम सूलियों पर देते है
समझ आ ही जाऊंगा तुम्हे कभी ना कभी
(आज) ग़र नहीं मेरे अश’आर में मानी ना सही

[हज़रत ग़ालिब के कदमों में अर्पित]

(रफत आलम)

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