क्या खोया क्या पाया…(ग़ज़ल)

 जुनून-ए-इश्क की यह भी इंतहा देखी
ज़हर दिया किसी ने ज़हर खा लिया।

लाखों के खिलोनों से ना हँसा कोई
किसी को झूंठे बर्तन ने बहला लिया।

गरीब की बेटी जलाई गई सरेआम
भूख ने एक धोखा फिर खा लिया।

मुंडेरों की याद किसी दिन रुलाएगी
खेतों पर तो तूने शहर बसा लिया।

आदमियों की बस्ती में लगी आग
शैतानो ने जब भी नाम-ए-खुदा लिया।

बांस जो थे अकड़े और तनते गये
फल-लदे दरख्तों ने सर झुका लिया।

अँधेरा मांग रहा था रौशनी का सूद
तंग आके किसी ने घर जला लिया।

कुष्ट-आश्रम गया था मिला है सकून
कुछ खोया था बहुत कुछ पा लिया।

शीशा-बदनों को बिखरा हुआ देख कर
शहर ने दिल को पत्थर बना लिया।

कहा होगा कुछ आँखों की नमी ने
मैंने कब तेरा नाम ओ बेवफा लिया।

तुम कहो अब कहाँ जाओगे “आलम
साथियों ने तो घरों का रास्ता लिया।

(रफत आलम)

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4 टिप्पणियाँ to “क्या खोया क्या पाया…(ग़ज़ल)”

  1. बेहतरीन ग़ज़ल पढ़वाने के लिए आभार, रफ़अ़त साब!

  2. janab nishant saab,bahut shukriya bhyan mein lene ke liye.

  3. मुंडेरों की याद किसी दिन रुलाएगी
    खेतों पर तो तूने शहर बसा लिया।

    आदमियों की बस्ती में लगी आग
    शैतानो ने जब भी नाम-ए-खुदा लिया।

    बांस जो थे अकड़े और तनते गये
    फल-लदे दरख्तों ने सर झुका लिया।
    योँ तो पूरी गज़ल लाजवाब है मगर ये शेर तो कमाल के हैं। आलम भाई बहुत बहुत बधाई।

  4. nirmala.kapila ji abhari hoon apka .apki comment se hosla mila hai .shukriya

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