जिंदा हूँ इस तरह के … (कविता- रफत आलम)

कई बार यूँ ही
ज़हन में बनते है संवाद ….

कैसे हो?

तुम्हारे सामने हूँ

क्या हालत बना रखी है?

अच्छा हूँ

फिर पी रखी है?

तुम्हे भुलाने के लिए

क्या भूल गये?

खुद को भूल गया हूँ

पागल हो!

वक्त के गुबार में
वह छिप जाती है
आकाश परे जाकर

और मैं
मैं अब भी जिंदा हूँ|

 

(रफत आलम)

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5 टिप्पणियाँ to “जिंदा हूँ इस तरह के … (कविता- रफत आलम)”

  1. बहुत सही लिखा आपने रफत जी,
    यादें भी अक्सर उदास कर जाती हैं।

  2. इशारा, एक उनका काफी है /
    निगाहें क्यो इधर नही होती ?

  3. जी हाँ ,राकेश जी कई बार जब आदमी अकेला होता है स्मर्तियाँ तरह तरह के बिम्ब बनाती है कभी उजले कभी काले और जिंदगी अपना रास्ता लिए चलती रहती है .शुक्रिया

  4. श्रीमान प्रक्रति जी ,अपने ध्यान दिया टूटी फूटी रचना पर ,बहुत धन्यवाद .

  5. ek dil ko chu lene wali kirti

    isake aage aur kya kanhu , mere paas shabd nahi hai .

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