विलियम ब्लेक के नाम

Don’t adore flowers of happiness as nectar of sorrow is hidden behind it

(William Blake)

विलियम तुमने क्यों
कमतर माना
खुशी को?

क्या तुम स्वीकार नहीं करना चाहते थे
मानव जीवन में खुशी के क्षणों का महत्व?

इन्ही क्षणों की बदौलत
जीवन के दुखों से लड़ने की शक्त्ति मिलती है

यदि खुशी स्थायी नहीं है तो
गम ही कौन सा सदा रहने वाला भाव है?

गम की घटाओं को घिरते आते देखते रहे
तब तो जी चुके जीवन!

तुम साथ यह भी तो कह सकते थे
कि मत डरो
गम रुपी मकरंद से
क्योंकि
इसका तोड़ है हँसी के पास
खुशी के पास।

एक खुली हँसी माथे से शिकन हटा देती है
रात-दिन के तनावों से तनी नसों में
ऊर्जा का संचार करती है।

कोई कैसे
प्रफुल्लित मन की
मुस्कान को दबा ले
उदास बैठ जाये
मुँह लटका कर
यह सोचकर कि
खुशी के फूलों के पीछे
गम रुपी मकरंद छिपा है?

जब जब जीवन हँसने का
खिलखिलाने का मौका दे
तब तब क्यों न उसका आनंद लिया जाये!

यदि तुम ये कहते कि
खुशी को ही जीवन का सम्पूर्ण भाव न समझो
तो सहमत हुआ जा सकता है।

खुशी भी तो जीवन का एक अंग है
जैसे गम है।

जीवन की सम्पूर्णता तो
इसके सारे भावों को
संतुलित रुप से
जीने में ही है न
किसी एक खास भाव के साथ
बह जाने में तो है नहीं।

… [राकेश]

[William Blake (28 November 1757–12 August 1827)]
चित्र साभार उनके ऊपर बने विकीपीडिया पेज से

About these ads

2s टिप्पणियाँ to “विलियम ब्लेक के नाम”

  1. Don’t adore flowers of happiness as nectar of sorrow is hidden behind it
    राकेश जी ,विलियम ब्लेक जी के सुंदर वचन को जिस प्रकार अपने अंदाज़ में कविता की माला में गूंथा है काबिलेतारीफ है.जीवन के खुशी और दुख दोनों गाड़ी के २ पहियों समान हैं दोनों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती .परंतु किन्ही लोगों को दुख से लगाव होता है या यूँ कहूँ दुख ही उनके लिए सुख है तो गलत ना होगा. पर यह सामन्य लोग नहीं .क्रष्ण बिहारी नूर साब ने कहा है
    बेनियाज़ दुख सुख से रह के जी ना पाउँगा /सुख मेरी तम्मना है दुख मेरा मुकद्दर है .धन्यवाद

  2. धन्यवाद रफत जी,
    संतुलन और प्राकृतिक रुप से जीना बहुत जरुरी है।
    सुख या दुख दोनों के पीछे भागने से असंतुलन आता ही आता है।
    वे तो अपने से आते हैं हरेक के जीवन में।
    यह भी देखा गया है कि कुछ कलाकार जान कर दुख को गले लगाये रखना चाहते हैं क्योंकि वे अंदर से ऐसा समझते हैं कि दुखी रहकर उनके अंदर से रचनात्मक ऊर्जा ज्यादा बहती है। जैसे के.एल.सहगल साब को ऐसा भ्रम था कि वे बिना शराब पिये अच्छा गाना नहीं गा सकते। नौशाद जी ने उनसे उनके अंतिम दौर में बिना पिये गीत गवाये और वे सुपर हिट गीत रहे। सहगल साब ने स्वीकार की अपनी गलती पर साथ ही कहा कि अब तो बहुत देर हो चुकी है। अगर दुख और शराब में जरुरत से ज्यादा रुचि न दिखाते सहगल साब तो कई बरस और जिंदा रहते।
    मीना कुमारी भी दुख को छोड़ना पसंद नहीं करती थीं। ऐसा नहीं था कि सुख आये ही नहीं उनके जीवन में पर उनकी प्रकृति हे कुछ ऐसी बन गयी थी कि गम को गले लगाने में उन्हे अच्छा लगने लगा था।
    ये सब अंसतुलन है, आध्यात्मिक और धार्मिक रुप से तो बहुत ही गलत।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 84 other followers

%d bloggers like this: