लड़की – यलगार हो ….(कविता – रफत आलम)

 

लड़की!

गर्भपात की छुरी से बच कर
तू अगर दुनिया में आ सकी

दादी की नाराज़ आँखों से स्वागत होगा तेरा
माँ की लोरी  में बेबसी खड़ी मिलेगी

बाप की पेशानी के बल गहरायेंगे
तेरा बढ़ता कद देख कर

घर के बाहर कदम जो रखा
लानत मलामत सुननी पड़ेगी

गिरवी रहगी तेरी आज़ादी सदा
पीहर हो के पिया के घर
होश खोने की सजा रुसवाई है
मीठे गोश्त के शिकारी
प्यार या जब्र के जाल लिए
तेरी गफलत की टोह में हैं

देख फँस ना जाना
जिंदगी कहीं मौत ना बन जाए

मैंने रोज तुझे
गांव की चौपाल पर संगसार होते देखा है
दरिंदों के पंजों में नुचते लुटते देखा है
सुहागजोड़ा पहने जलते देखा है

ए दुर्गा, मरियम ओ हव्वा की हमजिंस
सहती है ये ज़ुल्म ओ सितम क्यों

उठा सर, अपने होने का एलान कर –
मैं औरत हूँ तुम्हारा आधा हिस्सा
मैं बेटी, बहन और तुम्हारी माँ भी हूँ
आदमजाद!
मुझे अदब से सलाम करो।

 

(रफत आलम)

6 टिप्पणियाँ to “लड़की – यलगार हो ….(कविता – रफत आलम)”

  1. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

  2. truly brilliant..
    keep writing……all the best

  3. रफत जी,

    सही कहा आपने।

    अपने अस्तित्व और सम्मानजनक जीवन के लिये नारी को उठ खड़ा होना ही चाहिये और नारी के खिलाफ खड़ी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जंग छेड़नी चाहिये।

  4. सुपर्ब !
    बेहद सटीक और प्रभावशाली रचना …

  5. बहुत ही अर्थपूर्ण और मार्मिक कविता.
    अपने इर्द-गिर्द देखता हूँ तो लगता है ज़माना बहुत बदल गया है, अब रीत-रिवाज़ के नाम पर कोई किसी ही जान और आबरू से नहीं खेलेगा पर अख़बारों की सुर्खियाँ कुछ और बयान करतीं हैं.
    दुनिया को इंच-इंच के रफ़्तार से नहीं बल्कि तूफानी तेज़ी से बदलने की ज़रुरत है.

  6. सम्माननीय मित्रों .धन्यवाद.कल सवेरे पेपर में कृषना पुनिया जी की बात बालिका भूर्ण हत्या पर पढ़ने के बाद विचार जन्मा था .हम सब के लिए सोच का विषय है .धन्यवाद.

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