गरीबी में पतित होता जीवन …(कविता – रफत आलम)

भूख और पसीने के बीच
गहरा है रिश्ता।

मजदूर
फावडा, कुदाल और मशीन पर झुका हुआ
तने बाजू , खिंची हुई नसें
पिचके गाल तम्बाकू भरे
बहता हुआ पसीना
सारे दिन लगातार।

सरे शाम बदन की थकन
दारू के अड्डे से बहकती हुई
खाली जेब लौटती है।

झोंपड़ी की नन्ही भूखी आवाजें
आधा अधूरा चुग दुबक गयी हैं।

रात खाने पर होती है लड़ाई
कुटती है एक खाँसती औरत।

(रफत आलम)

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One Comment to “गरीबी में पतित होता जीवन …(कविता – रफत आलम)”

  1. [रात खाने पर होती है लड़ाई, कुटती है एक खाँसती औरत]

    रफत जी,
    बहुत अच्छी कविता जो गरीबी की पूरी कहानी कह देती है।
    इसे पढ़कर गुरुदत्त साहब की प्यासा फिल्म का गीत याद आ जाता है –
    ये बेरुह कमरों में खांसी की खन-खन… जिन्हे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं।

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