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अक्टूबर 13, 2010

बरसों की साध …(कविता- कृष्ण बिहारी)

 

बरसों बाद दिखी ज्ञानवती
ज्ञान… अरे वही, ज्ञानवती
जिसे सब ज्ञानिया कहते थे,
मैं गया था गाँव
वह आई थी मायके
मेरे गाँव से दो ही परग पर तो
उसका मायका है!

उसके बचपन का घर
उसका अपना गाँव,
जहाँ गुजरा था हमारा बचपन
मैं चला आया था शहर
वह रह गयी थी वहीं
हाँ, उसकी शादी भी तो
न जाने कब हो गयी थी
मगर इससे क्या फर्क पड़ता है
जवानी के आने में?

कभी चाहता था मैं उसे
इसलिये नहीं कि
विवाह कर लेता उससे
वह प्रजा थी हमारी
और समझता था मैं
अपना हक उस पर
उसने नहीं जताया कभी हक
इज़हार नहीं किया कभी
अपने प्यार का
मगर देखती थी मुझे
हमेशा चोर-दृष्टि से…
प्यार से,
ऐसा हमेशा सोचता था मैं
बस, इससे ज्यादा नहीं
उन दिनों
जब कभी दिखती थी वह मायके में।

इस बार बरसों बाद जब मैं उसके गाँव गया
छोटे नाना की बारात के लिये
जाज़िम और गलैचा लाने तो
मिलने पर पूछ ही लिया उसने-
कभी आई थी
हमारी याद?

क्या बोलता मैं उत्तर में
झूठ या कि सच
या कि यह कि वक्त्त बेरहम है
या मैं कह देता-
“ज्ञान तुम्हारी जगह तो किसी और ने शहर में ले ली”,
तो न जाने क्या सोचती वह
मगर कुछ तो कहना था न,
उसके सवाल के जवाब में।

मैंने भी सवाल ही किया –
“क्यों ऐसा क्यों पूछा तुमने”?
बस मन किया…- उसने कहा…-
पानी पी लेंगे मेरे हाथ का…
कितना तो घाम है…
आग लगे सूरज को।

पी लूँगा … ले आओ
शब्द जैसे अपने आप आ गये बाहर।

वह लाई दौड़कर एक लोटा पानी
एक बड़ा बताशा
किसी बक्से में से ढ़ूँढ़कर
जिसे रखा था उसने बड़े जतन से,
जून की उस दोपहर
मैंने खाया एक पूरा बताशा और पिया
एक लोटा पानी,
मैं कुछ कहता इससे पहले बोली वह-
हो गई साध पूरी बरसों की।
मैं क्या कहता उससे…
एक हरिजन लड़की
जो मात्र इतने भर से
हो गयी थी तृप्त
समूची ज़िंदगी के लिये
सिर्फ देखता रहा उसके गोरे-गोरे
भरे-भरे चेहरे को
हम दोनों की बरसों की साध में
उतना ही अंतर था
जितना होता है
कपट और मासूमियत में

{कृष्ण बिहारी}

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