उधार का भाग्य…

प्रकाश माइक के पास पहुँचे। उन्होने सामने बैठी और खड़ी भीड़ को देखा और बोलना शुरु किया।

आज मैं अंतिम बार इस स्कूल के प्रिंसीपल के रुप में आप सबसे बात कर रहा हूँ। इसी जगह खड़े होकर मैंने बरसों भाषण दिये हैं। आज जब मेरी नौकरी का अंतिम दिन है तो मैं सोचता हूँ कि इस शिक्षण संस्थान की नौकरी से तो मुक्ति मिल रही है पर क्या कल से मेरे अंदर बैठा शिक्षक भी सेवानिवृत हो जायेगा? क्या एक शिक्षक कभी भी अपने कर्तव्य से मुक्त्त हो सकता है? कुछ सवाल हैं जो मेरे अंदर उमड़ रहे हैं, उनके उत्तर भी मिल ही जायेंगे।
इस परिसर में इस मंच से अपने अंतिम सम्बोधन में एक कथा आप सबसे, विधार्थियों से खास तौर पर, कहना चाहूँगा।

बहुत साल पहले की बात है।

एक लड़का था। उम्र तकरीबन आठ-नौ साल रही होगी उस समय उसकी। एक शाम वह तेजी से लपका हुआ घर की ओर जा रहा था। दोनों हाथ उसने अपने सीने पर कस कर जकड़ रखे थे और हाथों में कोई चीज छिपा रखी थी। साँस उसकी तेज चल रही थी।

घर पहुँच कर वह सीधा अपने दादा के पास पहुँचा।

बाबा, देखो आज मुझे क्या मिला?

उसने दादा के हाथ में पर्स की शक्ल का एक छोटा सा बैग थमा दिया।

ये कहाँ मिला तुझे बेटा?

खोल कर तो देखो बाबा, कितने सारे रुपये हैं इसमें।

इतने सारे रुपये? कहाँ से लाया है तू इसे?

बाबा सड़क किनारे मिला। मेरे पैर से ठोकर लगी तो मैंने उठाकर देखा। खोला तो रुपये मिले। कोई नहीं था वहाँ मैं इसे उठा लाया।

तूने देखा वहाँ ढ़ंग से कोई खोज नहीं रहा था इसे?

नहीं बाबा। वहाँ कोई भी नहीं था। आप और बाबूजी उस दिन पैसों की बात कर रहे थे अब तो हमारे बहुत सारे काम हो जायेंगे।

पर बेटा ये हमारा पैसा नहीं है।

पर बाबा मुझे तो ये सड़क पर मिला। अब तो ये मेरा ही हुआ।

दादा के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

नहीं बेटा, ये तुम्हारा पैसा नहीं है। उस आदमी के बारे में सोचो जिसका इतना सारा पैसा खो गया है। कौन जाने कितने जरुरी काम के लिये वह इस पैसे को लेकर कहीं जा रहा हो। पैसा खो जाने से उसके सामने कितनी बड़ी परेशानी आ जायेगी। उस दुखी आदमी की आह भी तो इस पैसे से जुड़ी हुयी है। हो सकता है इस पैसे से हमारे कुछ काम हो जायें और कुछ आर्थिक परेशानियाँ इस समय कम हो जायें पर यह पैसा हमारा कमाया हुआ नहीं है, इस पैसे के साथ किसी का दुख दर्द जुड़ा हो सकता है, इन सबसे पैदा होने वाली परेशानियों की बात तो हम जानते नहीं। जाने कैसी मुसीबतें इस पैसे के साथ आकर हमें घेर लें। उस आदमी का दुर्भाग्य था कि उसके हाथ से बैग गिर गया पर वह दुर्भाग्य तो इस पैसे से जुड़ा हुआ है ही। हमें तो इसे इसके असली मालिक के पास पहुँचाना ही होगा।

प्रकाश ने रुककर भीड़ की तरफ देखा, सभी रुचि के साथ उन्हे सुन रहे थे। वे आगे बोले।

किस्सा तो लम्बा है। संक्षेप में इतना बता दूँ कि लड़के के पिता और दादा ने पैसा उसके मालिक तक पँहुचा दिया।

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद की बात है। लड़का अपने दादा जी के साथ टहल रहा था। चलते हुये लड़के को रास्ते में दस पैसे मिले, उसने झुककर सिक्का उठा लिया।

उसने दादा की तरफ देखकर पूछा,”बाबा, इसका क्या करेंगे। क्या इसे यहीं पड़ा रहने दें। अब इसके मालिक को कैसे ढ़ूँढ़ेंगे?”
दादा ने मुस्कुरा कर कहा,” हमारे देश की मुद्रा है बेटा। नोट छापने, सिक्के बनाने में देश का पैसा खर्च होता है। इसका सम्मान करना हर देशवासी का कर्तव्य है। इसे रख लो। कहीं दान-पात्र में जमा कर देंगे।

बाबा, इसके साथ इसके मालिक की आह नहीं जुड़ी होगी?

बेटा, इतने कम पैसे खोने वाले का दुख भी कम होगा। इससे उसका बहुत बड़ा काम सिद्ध नहीं होने वाला था। हाँ तुम्हारे लिये इसे भी रखना  गलत है। इसे दान-पात्र में डाल दो, किसी अच्छे काम को करने में इसका उपयोग हो जायेगा।

लड़के को कुछ असमंजस में पाकर दादा ने कहा,” बेटा उधार का धन, भाग्य और ज्ञान काम नहीं आता। वह अपने साथ मुसीबतें भी लाता है। अपने आप अर्जित किया हुआ ही फलदायी होता है”।

लड़के के दादा एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे।

आज वह लड़का आपके सामने आपके प्रिंसीपल के रुप में खड़ा है। ईमानदारी और स्वयं अर्जित करने की शिक्षा मैंने अपने बाबा से ग्रहण की थी। मुझे संतोष है कि उनकी शिक्षा के कारण मैं जीवन में ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सका। मुझे भरपूर संतोष है। आज मैं अपने बाबा के द्वारा दी गयी सीख आप सबको सौंपता हूँ। मुझे विश्वास है, कि यहाँ मौजूद सारे लोग नहीं तो कुछ अवश्य ही इस विरासत को अपनायेंगे। कुछ भी अर्जित करने की इच्छा हो उसे स्वयं ही अपनी बुद्धि और लगन से प्राप्त करें। ऐसा करना आपके लिये एक साफ-सुथरे और तनाव रहित जीवन की बुनियाद प्रदान करेगा।

…[राकेश]

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6 टिप्पणियाँ to “उधार का भाग्य…”

  1. bahut badiya rachna..ye sahi hai ek teacher kabhi apane kam se retire nahi hota….

  2. बहुत ही प्रेरणाप्रद कथा। पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

  3. राकेश जी ,…बेटा उधार का धन, भाग्य और ज्ञान काम नहीं आता…इतनी सुंदर और प्रेरक कथा लिखी है कि आनंद आ गया…. हमारे देश की मुद्रा है बेटा। नोट छापने, सिक्के बनाने में देश का पैसा खर्च होता है। …आसानी से किसी कच्चे मन को ज्ञान और जीवन दर्शन बताने हेतु मार्गदर्शन तथा आदर्श जीवन जीने की कुंजी इस कथा में है .

  4. धन्यवाद प्रवीण जी,
    प्रसन्नता हुयी कि आपको पसंद आयी

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