वक्त का चलन … (गज़ल – रफत आलम)

वक्त का चलन खराब है ना सर उठा
बचा खुद को देख के वो पत्थर उठा

गुमराही लिखी गयी हम लोगों के वास्ते
ना कोई अवतार आया ना पैगम्बर उठा

ऐसा ना हो पगड़ी पावों  में  आ गिरे
बुलंदियों के चाव में इतना ना सर उठा

बालू के कण ने पढाया बुलंदी का पाठ
बूँद की गोद से निकल कर समंदर उठा

रोती हुई तस्वीरों का खरीदार बने कौन
दिखाना है तो कोई सुहाना मंज़र उठा

आओ सो जाओ दूर से आया था बुलावा
मुसाफिर चल दिया बोरिया बिस्तर उठा

हो रहा था फैसला ए जुर्म ए मोहब्बत
दीवाने खड़े थे मौत को सर पर उठा

पंचायत के सामने लैला मजनू बंधे थे
और गांव दोड़ा जा रहा था पत्थर उठा

सच केवल नील कंठ ही है के जिसने
अमृत का प्याला छोड दिया ज़हर उठा

सुकरात की याद में अक्सर ए  ‘आलम
प्याले तो उठे ना जाम ए ज़हर उठा

(रफत आलम)

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4s टिप्पणियाँ to “वक्त का चलन … (गज़ल – रफत आलम)”

  1. बालू के कण ने पढाया बुलंदी का पाठ
    बूँद की गोद से निकल कर समंदर उठा

    रोती हुई तस्वीरों का खरीदार बने कौन
    दिखाना है तो कोई सुहाना मंज़र उठा

    खूबसूरत शेर

  2. बहुत ही सुन्दर शब्दों में आपने अपने गजल की अनुभूति की अभिव्यक्ति दी हैं |
    आपको अभिनंदन

  3. दीपक जी तहे दिल से शुक्रिया

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