ध्वनियाँ …. (कविता- कृष्ण बिहारी)

एक नाद है
जो गूँजता है
मुझमें डमरु की तरह शिव के।

मुझे मिलती हैं ध्वनियाँ
करती रहती हैं मेरा निर्माण अहर्निश।

मुझमें गूँजती हैं मेरे गाँव की नदी
और मेरे शहर की हर छटपटाहट।

मेरा शहर मजदूरों का शहर है
गाँव और शहर
दोनों जानते हैं अच्छी तरह हर कदम यह
कि जिस दिन वे मेरी स्मृति बनेंगे
बढ़ जायेगा मेरा अधूरापन और।

मेरी आवाज उनके कानों में उतरती है
मंदिर की घंटियों- सी
वे पुकारते हैं मुझे शंख ध्वनि बनकर
इस अपनेपन के आगे बौनी लगती है हर उपलब्धि
जैसे कोई जहाज शोर मचाता
हवाओं में गुम हो जाये
गायब हो जायेंगी उपलब्धियाँ छायाओं- सी
सिनेमा का परदा हो जायेगा
मध्यांतर- सा कोरा।

मुझे रहना है ध्वनियों के साथ
सुनना है शिव के डमरु की तड़क
महसूसना है समय की शक्ति को
छोड़ने हैं शब्द
करनी है रचना ईश्वर की तरह
निभाना है कवि-धर्म।
अपनी यात्राओं में
पार करने हैं अनगिनत दुर्गम रास्ते
होना है एक दिन मुझे शेरपा तेनजिंग
अपने हिमालय के लिये
और फिर देनी है आवाज ब्रह्मांड को।

{कृष्ण बिहारी}

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One Comment to “ध्वनियाँ …. (कविता- कृष्ण बिहारी)”

  1. करनी है रचना ईश्वर की तरह/पार करने हैं अनगिनत दुर्गम रास्ते
    होना है एक दिन मुझे शेरपा तेनजिंग/अपने हिमालय के लिये
    और फिर देनी है आवाज ब्रह्मांड को।

    शिव के डमरु के नाद की विशाल ध्वनि की भांति बड़े संकल्प गूँजते हैं कविता में

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