बहुरुपिये…(कविता- रफत आलम)

मुखौटे लगा कर
छलने वाले बहरूपियो
हमें ठग कर क्या लोगे ?

खून पसीना
फुटपाथ
टपकती खोली|

नहीं, नहीं
तुम तो
लाचारी
गरीबी
भुखमरी
बेघरी और बेबसी के सौदे कर
मसीहा वाला मुखौटा ओढ़े
महलों की मीनार पर
जा ही बैठे हो |

वक्त
एक भूखा बनकर
पार्टी की झूठन
चुनते हुए सोच रहा है
बहरूपिये
मुखौटा लगाते लगाते
अपना चहरा भूल गये|

वही एक
दूध को तरसते
बच्चे वाला
ज़र्द चेहरा।

(रफत आलम)

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One Comment to “बहुरुपिये…(कविता- रफत आलम)”

  1. रफत जी,
    जड़ों को भूल कर दिखावे में खो जाने वाली भीड़ को बड़े अच्छे तरीके से आपने अपनी कविता में पेश किया है।

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