गाँधी : क्या खूब कारीगरी है महात्मा

ओ रे महात्मा !
एक सदी बीत गयी तुझे गाली खाते खाते
कितने सारे लोग
गाली देते हैं तुझे
जब वे बहस करते हैं
अपने कमरों में
पान की दुकानों पर
गलियों में कूचों में
होटलों में
विश्वविधालयों में
यहाँ वहाँ
इधर उधर
इस जगह उस जगह
हर जगह तुझे
गालियों से विभूषित किया जाता है।

अपनी कमजोरियों को नज़रअंदाज़ करते हुये
तेरे आलोचक कोसते हैं तुझे –
अरे बूढ़े!
तू ही तो था
जिसके कारण
भारत का बँटवारा हुआ
हम फसल काट रहे हैं
उन समस्यायों की
जिनके बीज तूने बोये थे।

लोगों को विश्वास नहीं है
अपनी साधारण समझ पर ही
परन्तु वे चुनौती देते हैं
तेरी सामाजिक और राजनीतिक समझ को
वे कहते हैं –
तू था ही ऐसा लुजं-पुंज आदमी
तभी तो झट से असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया
अरे बाइस पुलिसिये ही तो जलाये थे
भीड़ ने,
अंग्रेजों ने क्या कम
जुल्म ढ़ाये थे
आम जनता पर?
पर नहीं तुझे भारत के लोगों के
दुख दर्द से क्या मतलब था,
तुझे तो अहिंसा के वायरस ने
बीमार किया हुआ था।

लोग कुछ नहीं करते दूसरों के लिये
पर वे तुझ पर आरोप लगाते हैं –
तू पूरी ज़िंदगी
सिर्फ और सिर्फ अपने लिये जिया
तू जिया बड़ा नाम कमाने के लिये।

लोग जो बारह से पचास तक
की आयु वाली किसी भी नारी का
अपनी वासना भरी दृष्टि से
चीर-हरण करने में हर समय
व्यस्त रहते हैं
वे ही तेरे ब्रहमचर्य के
प्रयोगों का
मज़ाक उड़ाते हैं
वे खिल्ली उड़ाते हैं तेरी-
क्यों तुझे बुढ़ापे में
कम उम्र की युवतियों के
कँधों का सहारा लेने की
आदत लगी?

हिन्दू चिल्लाते हैं –
तेरे ही कारण ये मुसलमान
इतना इतराते रहे हैं
मुसलमान जो
मोहम्मद गोरी, महमूद गजनवी, खिलजी
तैमूर, बाबर, औरंगज़ेब जैसे
दुर्दांत और क्रूर आक्रमणकारियों के
वंशज हैं
उन्हे तूने हिन्दुओं के
बराबर का मान लिया!
तू भूल गया
कैसे सदियों से हिन्दुओं को
सताया गया है
उनके सब घृणित कामों को
भूल कर तूने उन्हे
प्रेम दिया
ऐसी आततायी कौम के लोगों के
हितों के लिये
तूने आमरण अनशन किये!
जिन मुसलमानों ने भारत की
पीठ में छुरा घोंप दिया
और पाकिस्तान बना दिया
उन्ही के लिये
पचपन करोड़ की राशी देने के लिये
तू फिर से
खाना-पीना छोड़कर
खटिया पर लेट गया
धिक्कार है
तुझ पर ओ बूढ़े,
कितने घृणित कार्य थे तेरे
कितनी घटिया सोच थी तेरी
तू अवश्य ही नर्क में गया होगा
तू हड्डियों का ढ़ाँचा मात्र था
एक कमजोर आदमी
तभी तू अहिंसा के झूठे
परदे के पीछे छिपा रहा उम्र भर
गोडसे ने कितना अच्छा काम किया
तुझे मार कर
अन्यथा तू तो आजादी के बाद
देश का बेड़ा ही गर्क कर देता।
उसने एक पवित्र काम किया!

बहुत सारे हिन्दू हल्ला मचाते हैं –

नीची जातियों के जो लोग ऊँची जातियों के लोगों की
सेवा करने के लिये जन्म लेते हैं
उन्हे तूने हरिजन -ईश्वर की संतान कह दिया!
अब मज़ा देख
वही लोग अब तूझे
कोसते हैं शैतान कहकर
तू ऐसे ही व्यवहार के काबिल था।

मुसलमान भी तुझे नफरत
भरी दृष्टि से ही देखते हैं
छाती ठोककर
वे तुझे कोसते हैं और दावे करते हैं-
तू हिन्दु जन्मा था
और तूने केवल हिन्दुओं के ही हितों
का ख्याल किया उम्र भर
और तूने मुसलमानों के लिये कुछ नहीं किया।

लोग कुछ भी नहीं पढ़ते तेरे बारे में
वे इतिहास, राजनीति, मानव विज्ञान, समाज विज्ञान
कुछ भी नहीं समझते
पर वे क्षण भर भी नहीं लगाते
तेरे द्वारा किये गये कामों को नकारने में।

वे कोसते हैं
तुझे और तेरे अहिंसा के सिद्धांतों को-
अंग्रेजों ने
भारत और भारतीयों का
जमकर शोषण किया
तब भी तूने जोर दिया कि
उनके साथ अच्छा सलूक किया जाये
कितनी तुच्छ मानसिकता थी तेरी

…………….

पर बापू
एक मजे की बात यह है कि
यह सब कहते हुये
लोगों की
जुबान लड़खड़ाती है
नफरत की ज्वाला में
जलते हुये
वे कह तो जाते हैं
पर खुद उन्हे भी पता होता है कि
वे सफेद झूठ बोल रहे हैं

और सबसे बड़े आनंद की बात तो यह है
महात्मा कि
पिछले साठ सालों में
हर दल की विचारधारा और राजनीति ने
भरकस कोशिश की है कि
जनमानस तुझे भूल जाये
तेरा अस्तित्व हर राजनीतिज्ञ को
कालिख से पुता हुआ जो दिखाने लगता है
नेताओं ने भरपूर प्रयास किये हैं तुझे
अंधेरे बंद कमरों में कैद रखने के
पर पता नहीं कैसे
तुम किसी न किसी कोने से
फिर उजाला फैलाते
सामने आ ही जाते हो।

ये तुम्हारी जादूगरी है
बड़े कमाल की!

बापू, उनके जीवन और उनकी विचारधारा में रुचि रखने वाले लोग बापू को समर्पित एक वेबसाइट देख सकते हैं

…[राकेश]

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7 टिप्पणियाँ to “गाँधी : क्या खूब कारीगरी है महात्मा”

  1. राकेश जी ,सुंदर अभ्वाक्ति दिल का सारा गुबार निकल कर रख दिया है .सच की सजा सदा ही सच के उप्सकों को गोली और सूली पर मिली है.पर सच कभी नहीं मरता .गांघी जी भी इसी लिए अमर हैं.२ अक्टूबर पर सच्ची श्रद्धांजलि

  2. बापू! मै भारत का वासी, तेरी निशानी ढूंढ रहा हूँ.
    बापू! मै तेरे सिद्धान्त, दर्शन,सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
    सत्य अहिंसा अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
    बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.

    कहने को तुम कार्यालय में हो, न्यायालय में हो,
    जेब में हो, तुम वस्तु में हो, सभा में मंचस्थ भी हो,
    कंठस्थ भी हो, हो तुम इतने ..निकट – सन्निकट…,
    परन्तु बापू! सच बताना आचरण में तुम क्यों नहीं हो?

  3. जे पी तिवारी जी
    बहुत अच्छी कविता पढ़वा दी आपने
    धन्यवाद

  4. अति उत्तम! गांधी जी की याद का सुन्दर वर्णन.

  5. मुझे लगा कि आप अपनी अंतिम पंक्तियों में कुछ कटाक्ष तर्क देंगे परन्तु आपने लोगों कि मनोदशा के मार्ग को अपनाना ही उचित समझा। अब ये तो लोगों लोगों पर निर्भर करता है। कई लोग जो गांधीजी के विरुद्ध आग उगलते हैं, उन बातों को सच मानकर ही उगलते हैं, भले ही आप कह सकते हैं कि उनकी आँखों पर झूठ का पर्दा पड़ा हुआ है लेकिन कम से कम उन्हें तो यही लगता है कि वे झूठ नहीं बोल रहे हैं।

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