इमारतों के सहारे मनुष्यता को हराता अधर्म… (कविता – रफत आलम)

इन दिनों
डरा हुआ है आदमी|

आसमान की हुकूमत का फैसला
ज़मीन पर होने वाला है|

छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर
आसमान बसने वाला है|

मंदिर की घंटियों में
मस्जिद की अजानों में
जाने क्यों कंपन सा है
आसमान ज़मीं पर जो उतर रहा है|

किस ओर से आयेगा आसमान
राम-रहीम की राह से
न्यायालय की निगाह से
या मानवता की कराह से|

इन दिनों
डरा हुआ है आदमी|

गये वक्तों की याद है उसे
आसमान को
धरती पर लाने का रास्ता
सदा ही
तलवारों ने चुना है|

चतुर आसमान
स्वर्ग उपर ही छोड कर आता है
नरक साथ लाता है|

कटे हुए सर, जलते मंज़र
लहुलुहान कस्बे शहर
मलबा बने स्वयं के घर|

आसमान देखता है संतोषपूर्वक
और
वापस लौट जाता है ऊपर

(रफत आलम)

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10 टिप्पणियाँ to “इमारतों के सहारे मनुष्यता को हराता अधर्म… (कविता – रफत आलम)”

  1. रफत जी,
    बड़ी माकूल कविता है।
    तुकबंदी का सहारा लें तो कहा जा सकता है

    गाते थे कभी हिन्दुस्तानी –
    तू हिन्दू बनेगा न मुसलमां बनेगा
    इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
    अब समय सुनाता है-
    न मंदिर बनेगा न मस्जिद बनेगी
    हिन्दू-मुसलमान के बीच ठनेगी
    मरेगी निरीह जनता
    नेताओं की चाँदी कटेगी
    जय बोलो सियासत की
    जय बोलो बेईमान की
    जय बोलो शैतान की

  2. बेहद गहन और सोचने को मजबूर करती है और आजकल हर दिल का यही हाल है।

  3. राकेश भाई यह तुकबंदी नहीं कविता है बस आप वय्वास्त्ता के कारण श्याद पूरी नहीं कर रहे

  4. वंदना साहिबा बहुत बहुत शुक्रिया.किसी का शेर है-सर उठाए फिर रहे हैं दरिदे हर सु /सर झुकाए इंसान नज़र आते हैं.

  5. रफ़त जी,
    कितना कटु सत्य कह दिया।

  6. वन्दना साहिबा शुक्रिया

  7. बेहतर कविता…
    समीचीन चिंताएं…

  8. धन्यवाद .रवि कुमार रावतभाटा जी.

  9. मिश्रा साब थैंक्स

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