सच और भ्रम …. (कविता- कृष्ण बिहारी)

सच और भ्रम
दोनों निरपेक्ष हैं
खुशी और गम की तरह।

शायद यह
एक तरह की संज्ञा शून्यता है
या फिर
वह तंद्रा
जिसमें जागते हुये भी
सोने का
और नींद में
जागते होने का
वहम बना रहता है।

अपने भीतर के मैं से
रात-दिन उलझता
बेचैनी और घबराहट के
डंक सहता
खुद से सवाल पर सवाल करता
बार-बार स्वयं को सराहता हूँ
कि
इतना सब कुछ होने पर भी
ज़िन्दगी से न भागने की
यह कैसी कसम खाई है।

मित्र, रिश्ते-नाते
छ्ल-कपट और घातें
विश्वास…आदि सब शब्द हैं
और शब्दों के अर्थ
जगह, जमीन, जलवायु
और पानी के साथ-साथ
बदलते हैं।

इन्हे ढ़ोते रहने से बचने वाले
हर तकलीफ से बच निकलते हैं।
जब दिख जाते हैं,
मिल जाते हैं
मुझे ऐसे लोग
तो अचानक किसी दूसरी दुनिया में
खुद के पहुँच जाने का पता चलता है
जिसके कायदे-कानून से मैं कभी
वाकिफ़ नहीं रहा।

{कृष्ण बिहारी}

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4 Responses to “सच और भ्रम …. (कविता- कृष्ण बिहारी)”

  1. बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने …….

    पढ़िए और मुस्कुराइए :-
    आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

  2. मित्र, रिश्ते-नाते
    छ्ल-कपट और घातें
    विश्वास…आदि सब शब्द हैं
    और शब्दों के अर्थ
    जगह, जमीन, जलवायु
    और पानी के साथ-साथ
    बदलते हैं। krishan bhihari ji bahut khoob likh hai.kaita puri hi sunder hai

  3. भाई जी…
    इस काले परिवेश में…अक्षरों को बांचने में….
    बेहद तकलीफ़ होती है…

    सच और भ्रम का पता ही नहीं लगता….

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