Archive for सितम्बर 26th, 2010

सितम्बर 26, 2010

दुनिया के ढ़ंग निराले … (रफत आलम)

गली कूचों में बे-बात ही बिखरा है बहुत
इन दिनों आदमी का लहू सस्ता है बहुत

आसमान के पास दोज़ख का चर्चा है बहुत
भुगत सको तो प्यारे यह दुनिया है बहुत

दुनिया की राह पर निकल तो जाँऊ मगर
खुद से बिछड जाने का खतरा है बहुत

उपर आने दे किसी को तो खुद गिर पड़े
चोटी पर जो बैठा है अकेला है बहुत

खो गयी तो भी बाखूब याद है मझे
किताबे जिस्मे यार तुझको पढ़ा है बहुत

क्या खौफ जो दुनिया दुश्मन बन गयी है
एक उसका आसरा है तो आसरा है बहुत

मेरे आज के रहनुमा से हार जायगा गिरगिट
मान लिया ये जानवर रंग बदलता है बहुत

झोपडियों के पास पहनने को कपडा नहीं
महलों में नंगे बदन बोले कपडा है बहुत

पीने के लिए मिलना ही दूभर है ‘ आलम
आंख का पानी तो आज सस्ता है बहुत

(रफत आलम)


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