ब्लॉग की दुनिया में एक घुसपैठिया …रफत आलम

नौकरी से रिटायर होने पर एक साथी ने उनसे मजाक में कहा था,” कहो दिलीप बाबू बुढ़ापा मानते हुये राम भजोगे, डर डर कर मरोगे या नेट वगैरहा की रंग-रंगीली दुनिया और ब्लॉग आदि से  मन बहला कर आनंद पूर्वक मरना चाहोगे”।
तब दिलीप सेवानिवृत होने के तत्काल बाद की भयानक शांति और जीवनचर्या में एकदम से आये बदलावों से परिचित न थे सो न तो साथी की बात समझ पाये और न ही कुछ उत्तर दे पाये।
पर शीघ ही पार्टियां और मेल मुलाकातें खत्म हुयीं और इन सब व्यस्तताओं से फारिग होकर एक दोपहर वे अकेले बैठे थे। कहते है ना – खाली दिमाग शैतान का घर सो उनके दिमाग में भी खुरापात ने घर कर लिया और उन्हे अपने साथी की कही बात याद आ गयी। उनके मन में ललक उठी कि कुछ दिन नेट के भी मज़े ले लें बाकी राम तो आखिर में भजना ही है।

ब्लॉग वाणी के ज़रिये ब्लॉग-संसार में जा घुसे। बस साब क्या कहें ब्लॉग की दुनिया के बारे में। अजीब अजीब से नाम उन्हे पुकार रहे थे और भाँति भाँति के सुंदर, औसत और साधारण पासपोर्ट साइज़ चेहरे उनका स्वागत कर रहे थे।

ब्लॉग संसार में विचरण करते हुये उन्हे एक साब, जो टी.वी. की दुनिया के ठीक ठाक से नाम वाले कलाकार हैं और जिनके उछल-कूद  भरे अभिनय से दिलीप अपनी ढ़ल गयी जवानी का दर्द भूल कर कुछ देर के लिये मस्त हो जाया करते हैं, का मुखडा एक ब्लॉग पर देखा।

दिलीप ने पहली एंट्री उन्ही के ब्लॉग में लगायी। दिलीप तो इस आशंका से ब्लॉग पर गये थे कि हीरो साब ने ज़रूर उछल-कूद में शामिल हसीन तारिकाओं के चटपटे किस्से लिखे होंगे पर वहाँ तो लघभग आधे किस्से सत्तारुढ़ पार्टी के नेताओं की फूहड़ स्तुति में लिखे गये थे और बाकी में दिनांक वार सामाजिक समस्यायें, बॉडी फिटनेस ,शायरी, हास्य और दुनिया भर के बारे में यह ऐसा है वह वैसा है जैसा लिखा था। नहीं थे तो हसीनाओं के अन्तरंग किस्से जिनकी तलाश दिलीप जी की ढ़ली जवानी के कांपते ऊबाल को थी।

उस ब्लॉग में एक कथा एक उमर दराज़ बूढी महिला से सम्बंधित थी। पति के स्वर्गवास होते ही पांच माह में ही उस बदनसीब को  बहुओं और बेटों ने  सड़क पर धकेल दिया था। बेचारी अब मंदिर के आगे भीख माँग कर किसी तरह अपना गुजारा कर रही थी। कथा मार्मिक लगी।  पोस्ट के नीचे टिप्पणी का बक्सा लगा दिख रहा था। पसीजे दिल से टिप्पणी वाला बक्सा खोल लिया।
पचास के लगभग  टिप्पणियाँ  लिखी थीं। आधी लाइन से डेढ़ लाइन तक की। वास्तविक जीवन के इतनी मार्मिक किस्से पर अजीबोगरीब टिप्पणियाँ देखकर मन और ज्यादा गीला हो गया।
ज़रा मुलाहिज़ा कीजिये टिप्पणियों के नमूनों का –
सुंदर है, साधुवाद, आभार आदि। बस इसी पर बात खत्म। दुखियारी बूढ़ी महिला की रूठी किस्मत के मुकदमे का फैसला एक शब्द में? वाह क्या इंसाफ था! अधिक किसी ने कलम को कष्ट दिया तो यूँ  लिख दिया था – अच्छा पोस्ट पढ़ाने के लिए धन्यवाद, कृपया मेरे लिंक्स – फलां फलां ,  भी देखें। और टिप्पणीकार का मतलब सिद्ध। समझ गये ना आप।
दिलीप यद्यपि कुछ हद तक मोहभंग की स्थिति में थे पर फर्ज़ मानकर अपने पसंदीदा अदाकार ब्लोगर महोदय की शान में कुछ कसीदे लिखे। माउस क्लिक और उनकी टिप्पणी भी दर्ज हो गयी। इसी ब्लॉग पर उन्हे एक ग़ज़ल भी दिखायी दी। उखड़े मूड को कुछ शांति प्रदान करने के लिये ग़ज़ल की शरण में चले गये।
ग़ज़ल बड़े ही रंगीन बैकग्राउण्ड और सुंदर अंदाज़ में शोभायमान थी पर शायर का नाम नीचे बिलकुल नन्हे अक्षरों में लगभग अदृष्य सा लिखा था। .गज़ल अच्छी लगने के कारण पूरी पढ़ी और कवि का नाम भी दिमाग में रट सा गया। उन्होने टिप्पणी वाला बक्सा यहाँ भी खोला और खँगाला। लगभग सभी टिप्पणीकारों द्वारा शायर के स्थान पर ब्लॉगर साब की शान में सुंदर गज़ल लिखने से सम्बंधित कलम कसीदाकारी की गयी थी।
प्रशंसागान में लीन टिप्पणियों के बीच बेचारे शायर की डेढ़ लाइन वाली गुहार भी गिरगिराती दिखायी दी कि साब हमारा नाम ऊपर लिख दो। लोगों में आपके शायर होने का गलतगुमानी हो रही है।

दिलीप शायर साब की काबलियत से खासे प्रभवित हो ही गये थे सो उन्होने लोगों की अल्पदृष्टि को इंगित करते हुये शायर और गज़ल की तारीफ में काफी कुछ लिख मारा पर यह क्या, टिप्पणी बक्से के उपर अंग्रेजी में लिखी हु्यी कुछ इस प्रकार की लिखावट प्रकट हो गई- युअर कमेन्ट इस सेव्ड और मोडरेटर द्वारा स्वीकृत होने पर छपेगी। देर तक इन्तज़ार करने के बाद निराश होकर लौटते वक्त नज़र जो पड़ी तो देखा- शायर की गज़ल के दो शेर ब्लॉगर साब की तस्वीर के ठीक नीचे छपे थे। दिलीप की आशंका बलवती हो गयी कि अब उनकी टिप्पणी कभी नहीं छपेगी।

दिलीप जी उखड़े मन से इधर उधर आँखे चला रहे थे कि स्क्रीन पर कुछ देखकर वे वे बेसाख्ता मुस्कराने लगे। एक ब्लॉग का नाम ही ऐसा था। एक अतिसुंदर महिला के चित्र के उपर लिखा था, “पुरुष के सर पर चप्पल”। चप्पल तो महिला की तस्वीर के सर पर थी और नाम ब्लॉग का था – पुरुष  के सर पर चप्पल। ऐसे कारनामे पर किसे हँसी न आती। दिलीप तुरंत ब्लॉग के भीतर हो लिए।
यहाँ भी दिलीप को निराशा ही मिली। सोच कर गये थे कुछ चंचलता होगी, हुस्न का जादू मर्द के सर पर नाचता दिखाई देगा, पर पहला ही पोस्ट था – पति देवता को कैसे मनाएं। फिर कविता थी- प्राण नाथ के चरणों की सौगंध। आगे थी करवा चौथ के व्रत की जानकारी आदि, आदि। यानि पुरुष के सर पर चप्पल के सिवा, मर्द के अहंकार की चापलूसी सम्बंधित सभी कुछ था।
दिलीप का पहले से उखड़ा मन थोड़ा और कसैला हो गया पर फिर भी अबला पर दया ही आयी. बेचारी बात तो सर उठाने की करती है, एम.एल.ए, सरपंच भी बन जाती है परन्तु  घूँघट के साथ। पुरुष  समाज बुरा हो तेरा। दिलीप को समझ नहीं आया कि क्या टिप्पणी करें सो चुपके से बाहर हो लिए।
दिलीप ने कई और ब्लॉगों के चक्कर लगाये। अंदाज़ लेखन के चाहे बिलकुल अलग रहे हों पर दो वस्तुओं की समानता लगभग सभी ब्लॉगों में बिना विविधता देखने को मिली – एक तो रचनायें, लेख और जानकारिया चाहे जो हों, कोई भी 10 से 15 साल से कम पुरानी  नहीं  थी या किसी से साभार उधार ली गयी थीं और दूसरी सभी टिप्पणीकार वही आधी से डेड लाइन वाली टिप्पणी जमाने में लगे थे। पाठक भूले तो नहीं हैं, सुंदर…आभार आदि वाली बात।

दिलीप का तो जी घबरा सा गया। लगा नमाज़ के चक्कर में रोज़े गले पड़ रहे हैं। उन्होने अपने दिमाग की खैर मनाने में ही भलाई समझी और निकल चले ब्लॉग संसार से बाहर की ओर। वापसी के रास्ते में एक ब्लॉग का अजीब सा नाम देख कर फिर से उत्सुकता जागी। माउस पर क्लिक और वे अंदर।
वहाँ भी वही राग- तेरी भी सफ़ेद मेरी भी सफ़ेद वाली बात देखने को मिली। खैर आ ही गये थे तो ब्लॉगर साब की उस १० वर्ष पुरानी रचना जिस के बारे में उन्होंने कितने ही अन्य ब्लॉगरों द्वारा चोरी का  दावा किया था, देखी। यानि चोरी से ये कम्प्यूटरों की कैद में बंद ब्लॉग भी अछूते नहीं। इतनी बड़ी तारीफ के बाद भी ना पढते तो रचना के साथ नाइंसाफी होती। अचानक नादान मन के लुभाने पर, टिप्पणी बक्से में नाम देखने के लालच ने उनसे वहाँ भी ब्लॉगर महोदय की शान में कसीदा लिखवाया और तुरत इनाम भी मिल गया – उनकी टिप्पणी भी कुछ दिनों के लिए अमर हो गयी।

ब्लॉगर साब की एक और कविता, जो कुछ नास्तिकता के विचार लिए हुये थी, पढ़ कर दिलीप आग-बबूला हो गये। अंजाम से बेखबर भीतर का आस्तिक जाग उठ खड़ा हुआ। कलम की स्याही आध्यमिकता से उबलने लगी। उन्होने खूब खरी- खोटी टिप्पणी ब्लॉगर जी की कविता के विरुद्ध लिख फेंकी। छापने की बात तो दूर अबकी बार तो टिप्पणी बक्से ने छापने सम्बंधित कोई सुझाव भी उन्हे नहीं दिया यानि टिप्पणी वाला बक्सा देर तक खाली ही रहा।

टिप्पणी छपवाने में मिली अब तक की असफलताओं से दिलीप की समझ में आ चुका था कि ब्लॉग सकून से पढ़ कर टिप्पणी छपाने के लिए ब्लॉगर और रचना, चाहे दो कौड़ी की भी ना हो, दोनों की तारीफ जरुरी है।
उन्होने एक और बात नोट की कि भले ही ब्लॉगर प्रतिकूल टिप्पणी को छापे न पर हर टिप्पणी बक्से के ऊपर टिप्पणीकार को आकर्षित करने हेतु ब्लॉगर द्वारा कुछ ना कुछ बेबाक राय छापने सम्बंधित आदर्श वाक्य जरुर लिखे होते हैं।

पुनश्च-:

(1) तीन दिन बाद जाने क्यों दिलीप के मन में हुडक उठी और उनके मन ने लालच दिया – जाओ देखो  तो सही, क्या पता ब्लॉगर महोदय ने अन्तर्रात्मा  की आवाज़ पर तुम्हारी टिप्पणी छाप ही दी हो। पर हाय रे ब्लॉग संसार, ब्लॉग भूमि पर उनके चंचल मन की तीसरी हार हुयी थी, उनकी टिप्पणियों का नामोनिशान तक मौजूद न था।

(2) दिलीप को भूला हुआ एक सबक याद आ गया- बाज़ार चाहे किसी का हो (भले ही बुद्दिजीवियों का ही क्यों ना हो) सौदे स्वलाभ के आधार पर ही किये जाते हैं।
(3) टिप्पणी छपवाने की कीमियागिरी दिलीप ने सीख ही ली थी और जल्द ही ढ़ेर सारे ब्लॉग्स पर उनकी टिप्पणियाँ चमचमाने लगीं।

(रफत आलम)

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7 टिप्पणियाँ to “ब्लॉग की दुनिया में एक घुसपैठिया …रफत आलम”

  1. वाह रफत साब! आप तो छुपे रुस्तम निकले! इतने दिनों से ब्लौग चला रहे हैं और बताया भी नहीं! खैर, बहुत उम्दा ब्लॉग बनाया है आपने. यह थीम हिंदी के लिए सूटेबल नहीं है इसलिए मशविरा दूगा कि मेरे ब्लॉग वाली थीम लगा लें. और कुछ कहने के पहले मुनासिब होगा कि एक नज़र आपकी पिछली पोस्टों पर भी डाल लूं. आपको जितना जानता हूँ उससे यह तय है कि आपको पढना एक दिलचस्प और खुशनुमा अहसास होगा.

  2. बढ़िया प्रस्तुति …….

    यहाँ भी आये और अपनी बात कहे :-
    क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द समाज को …?

  3. behtar lekhan !!!

    saleem
    9838659380
    swachchhcnsadesh.blogspot.com

  4. निशांत साब ,मेरे छोटे भाई हैं राकेश जी.में तो बेपतवार की नाव, डूबने की कोशिश में था .मुझे कलम थमा दी .सो टूटा फूटा लिख रहा हूँ .मेरा कुछ नहीं स्वा र्थ परिवार मेरी बकवास झेल रहा है .में आभारी हूँ.

  5. रवि कुमार जी आपका शुक्रगुज़ार हूँ.

  6. ओशो रजनीश साब ,बहुत शुक्रिया .ओशो मेरे पथपारदर्शक है .

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