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सितम्बर 23, 2010

एतबार … ग़ज़ल (रफत आलम)

मासूम फूल के तले हथियार छुपा था खार का
उँगलियों का दिल ज़ख़्मी हुआ बुरा हो बहार का

तेरे जाने के बाद सभी मंज़र रुक से गये
मेरी आँखों में ठहर गया मौसम इन्तज़ार का

ये उड़ते परिदे तो साँझ को घर लौट आएंगे
हमें जाने कहाँ छोड जाएगा रास्ता गुबार का

जिंदा लाश के सीने में पडा है टूटा हुआ दिल
दिया भी तो ना बन सका किसी मजार का

वो जो उसूलों का पाठ पढ़ा रहा था मुझे
दामन पकड़ कर चल दिया एक दुनियादार का

बेरोज़गारी की शिकायत के दफ्तर सब बंद हुए
नौकरी पर पहला हक है मंत्री के रिश्तेदार का

उसमे बड़ी कमी के बगल में छुरी नहीं रखता
आलम ’ आदमी नहीं है किसी भी एतबार का

(रफत आलम)

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