भयानक हानि

मतभेद…
शिकायतें…
नाराज़गी…
ग़लतफ़हमी…
झगड़े…
शोर…
मानसिक हिंसा…


अलगाव…


विचार-मंथन…
….

मानसिक शोर…

बीतता समय…

और ज्यादा बीता हुआ समय…

मौत का प्रवेश…

स्तब्धता …

आत्मग्लानि…
आत्मनिंदा…

दुख के आँसू …
पछतावे के आँसू…

यादें…

मौन ! …

जीवन भर के लिये खोया हुआ अवसर…

शायद कई जन्मों के लिये खोया हुआ अवसर…

भयानक हानि !


…[राकेश]

2 टिप्पणियाँ to “भयानक हानि”

  1. राकेश जी, कहानी लिख दी पूरी किसी नाकाम जिंदगी की .छोटी सी कविता में. आप ही के शब्द दोहराता हूँ – अलगाव…बीतता समय…

    और ज्यादा बीता हुआ समय
    …स्तब्धता यादें…
    …जीवन भर के लिये खोया हुआ अवसर…भयानक हानि !
    हाँ जानते है सभी पर नियति के हाथों बिके हुवे ,हालत के मारे तबाह होजते हैं जीवन.

  2. रफत जी,
    धन्यवाद,
    किसी भी नजदीकी रिश्ते में ऐसी स्थिति आ सकती है और आती है जब गलतफ़हमी से उपजी उलझी हुयी स्थितियों के वशीभूत आदमी गलत निर्णय लेता है, अहं को ज्यादा तवज्जो देता है और बाद में पछताने के सिवा कुछ नहीं हाथ लगता।
    उससे पहले वक्त्त होता है, रिश्तों को सही ढ़ंग से सहजने और संभालने के लिये। वाजिब समय निकल गया तो सब गया|
    सभी अपने आस-पास बल्कि अपने ही जीवन में इन बातों से रुबरु होते हैं। ऐसे ही कुछ विचारों से जन्मी थी ये पंक्तियाँ।

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