दीवाने की वफा … गज़ल (रफत आलम)

रूह से जिस्म तक बिकने का सामान किया
आज के आदमी ने खुद को दुकान किया

तेरे दर से उठाता किसकी मजाल थी
मौत ने आके तेरा काम आसान किया

अपनी वफ़ा का और तो क्या सबूत देता
दीवाने ने जिंदगी को जला के मसान किया

वासना के किसी गटर में उतर आया मैं
जिस्म की भूख ने जब भी परेशान किया

वो जो साथ मरने की कसम खाता था
वक्त तो देखो कैसे हमको अंजान किया

मैं  तो फ़ना हो गया ढेरो जमीं के नीचे
मेरी मौत ने क्या तुझे आसमान किया

यह रात भर की  मयकशी यह जिंदा खुदकशी
तुझे भुलाने का दिल ने ये सामान किया

नज़दीक से गुज़रा था एक खुश्बू का झोंका
याद के झोंको ने रास्ता मेरा सुनसान किया

हुस्न क्या है उसको भी पता चल गया
आईना देख कर आज खुद को हैरान किया

किसी रेस्तरां के पास से गुजर आया मैं
भूख ने जब ज्यादा ही कुछ परेशान किया

तेरी जफा की आबरू रखने के लिए जानां
लब सी लिए हमने खुद को बेजुबान किया

एक गुडिया पकड़ लाया बहलने के लिए
ले यह भी तेरा चाहा मेरी जान किया

सड़न माहौल की भी तुम ही भुगतो ‘आलम
गली के कीड़ों को तुम्ही ने आसमान किया

(रफत आलम)

2 टिप्पणियाँ to “दीवाने की वफा … गज़ल (रफत आलम)”

  1. ( तेरे दर से उठाता किसकी मजाल थी / मौत ने आके तेरा काम आसान किया
    वो जो साथ मरने की कसम खाता था / वक्त तो देखो कैसे हमको अंजान किया)

    बहुत खूब, आलम साहब

  2. राकेश जी ,मैं एक आवारा दो शब्दों का कवि स्वार्थ कि घनी शीतल छाव तले आ बैठा .यहाँ विचारों के खजाने से मोती उठा रहा हूँ. कुछ शब्दों में पिरोकर बतोर माला स्वार्थ टीम को नज़र किया है .आपने शेर चुने उसके लिए बहुत थैंक्स .

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